पंद्रहवी लोकसभा के कार्यों का विश्लेषण किया जाए तो ,इसमें सबसे
ज्यादा साख प्रधानमंत्री पद की घटी | यह भी तथ्य है, की इसके सबसे ज्यादा अवमूल्यन
की जिम्मेदार स्वयं कोंग्रेस पार्टी हैं |यह प्रबुद्धजनों के चिन्तन का विषय हैं,
कोंग्रेस ने ऐसा क्यों होने दिया ,या किया ?
Monday, 24 February 2014
Sunday, 23 February 2014
प्रबुद्ध नागरिकों से संवाद -
भ्रष्टाचार को समाप्त करना सरकारों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता हैं
| सरकारे अगर धर्म को साधकर ,चले तो यह हर समय संभव है | वरना चाहे लोकपाल लाया जाए
या जन-लोकपाल,समस्याओं का समाधान संभव नही होगा | क्योंकि पद को ग्रहण करनेवाला हर
व्यक्ति इसी देश का नागरिक होगा ;वह इसी समाज से चुना जायेगा |
प्रत्येक वस्तु धर्म के आधार पर टिकी है, उसका उपयोग धर्म के आधार पर
किया जायेगा तभी वह सार्थक परिणाम देगी और जीवन को उच्चतम शिखर पर ले जाएगी | समस्या
यह है, हमने धर्मनिरपेक्षता के ढोग में ,धर्म को ही जीवन से निकाल बाहर किया |
स्वामी रंगनाथानंद ने कहा के –वेदान्त दर्शन के आलोक में हम
‘’आध्यात्मिक’’ पद का सही अर्थ समझेंगे तो हम देखेंगे कि प्रबुद्ध नागरिकता मानव
के अध्यात्मिक विकास और जीवन की सार्थकता का एक अंग है | यह उस अध्यात्मिक विकास का
पहला सोपान है, धर्मनिरपेक्ष सोपान है जो महत्वपूर्ण और अनिवार्य है |आज हमे यह
आवश्यक सबक सीखना है | भगवद्गीता का सूक्ष्म अनुशीलन करने पर इस बात की सच्चाई
मालूम हो जाएगी | धर्म अध्यात्मिक विकास है | वह केवल कर्मकांड का कोई साधन नही | वह
मरने के बाद स्वर्ग पहुचने की लिए प्रवेश पत्र नही ! यह हम समझ लें तो यह सत्य भी
सहज विदित होगा कि नागरिकता मानव विकास का एक महत्वपूर्ण अविभाज्य अंग है |
मानव जीवन का राजनीतिक , आर्थिक ,सामाजिक अनुशासन ही वह आयाम है जिसे
धर्मनिरपेक्षता का क्षेत्र माना जाता है | आज हमे इन सभी क्षेत्रों में जी-जान से
काम करना है ;क्योंकि स्वामी विवेकानन्द जी ने गीता और उपनिषदों के दर्शन कि थाह
लगाने की वह अंतद्रष्टि दी है जिससे हम मानव-मानव के बीच और मानव-ईश्वर की बीच
संबंध स्थापित करने को अलग-अलग दर्शनों के रूप में नही ,एक ही दर्शन के रूप में
देख सकते है |
मानव में ईश्वर को देखना और मानव की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानना
इस अद्भुत दर्शन का सार है |
हमने ऐसी परिस्थितयों का निर्माण स्वयं ही कर लिया है की सज्जन व
दुर्जन व्यक्ति एक ही तुला में तोले जा रहें है |दुर्जन को सज्जनता की और उन्मुख
करना हमारा धर्म होना चाहिए | ईमानदारी से जीने वाले ठगे जाए यह अव्यवस्था है,जबकि
उन्हें तो पुरुस्कार मिलना चाहिए |’सब कुछ मेरा होना चाहिए,तथा दूसरों का क्या
होता है मुझे इसकी परवाह नही; यह मनोवर्ती बचकनी है | अधिकारों के मांग की
इतिश्री,कर्तव्यों के आरम्भ में होनी चाहिए |
क्या अधिकारों की मांग जारी रखना व कर्तव्यों को त्याग देना अराजकता
पैदा नही करता ?
‘’मनुष्य को परमात्मप्राप्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है |’’
मानव मात्र के कल्याण के लिये और समाज कल्याण के लिये गीता –ज्ञान का
सन्देश ,स्वामी रामसुखदासजी महाराज ने हमे बड़े ही सरल शब्दों में हमें समझया है | प्रस्तुत
लेख में- आज देश –काल व समाज में हमारी परिस्थितियों ,व हमारी समस्याओ के निराकरण
का रास्ता दिखाई पड़ता है | जिज्ञासु इस लेख को अवश्य पढ़े व ,चिंतन-मनन करे|
योगस्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयो विधित्सया ।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्य के लिए मैने तीनों योग बताये
है-ज्ञानयोग ,कर्मयोग और भग्तियोग | इन तीनों के सिवाय कल्याण का मार्ग नही है |
किसी आकृति विशेष का नाम मनुष्य नही,प्रत्युत मनुष्य वह है,जिसमें
सत् और असत् तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक हो | शरीर तो केवल कर्म-सामग्री है,
जिसका उपयोग केवल दूसरों की सेवा करने में ही है |
प्रत्येक मनुष्य वास्तव में साधक है |परमात्माप्राप्ति शरीर को नही
होती,प्रत्युत साधक को होती है | साधक अशरीरी होता है | उदहारणतः- मैं स्त्री
हूँ,मैं पुरुष हूँ,या अन्य जो ,मैं और हूँ की मान्यताएं संसारिक व्यवहार( मर्यादा ) के लिए
तो ठीक,पर परमात्म-प्राप्ति में ये बाधक है|
‘’मनुष्य को परमात्मप्राप्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है |’’
मुक्ति की मांग (स्वयं की भूख ) ज्ञानयोग से,दुःखनिवृत्ति की मांग
कर्मयोग से और परमप्रेम की मांग भग्तियोग से पूरी होती है |
‘’भोगी व्यक्ति स्वयं भी दुःख पाता है और दूसरों को भी दुःख देता है;
क्योंकि दुःखी व्यक्ति ही दूसरों को दुःख देता है-यह सिद्धांत है |’’
ज्ञानयोग का मार्ग –पराधीनता को मिटाने के लिए निष्काम होना बहुत
आवश्यक है |ममता के कारण शरीर,समाज,परिवार आदि की सेवा में बाधा ही लगती है |’’
भोग और संग्रह करना ही प्राप्त वस्तुओं का दुरुपयोग हैऔर उनकों दूसरों की सेवा में
लगाना ही सदुपयोग है |’’
कर्ता निष्काम हुए बिना कर्तव्य-कर्म का पालन नही होता और
कर्तव्य-कर्म का पालन हुए बिना प्राप्त परिस्थितियों का सदुपयोग नही होता |
कर्मयोग का मार्ग –मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने प्रति न्याय करे
और दूसरे के प्रति क्षमा-भाव रखे | ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी |चेतन अमल सहज सुख रासी
||
दूसरे का बुरा करनेवाला, बुरा चाहनेवाला दूसरे पर शासन तो कर सकता
है,पर सेवा नही कर सकता | समाज कि उन्नति सेवक के द्वारा होती है,शासक के द्वारा
नही |जो दूसरे का अधिकार है, वही हमारा कर्तव्य है | समाज में ज्यों-ज्यों अधिकार
पाने कि लालसा बढती जाती है,त्यों-ही-त्यों लोग अपने कर्तव्यों से हटते जाते
है,जिससे समाज में संघर्ष पैदा हो जाता है |
भग्तियोग का मार्ग –वह परमात्मा कैसा है,कैसा नही है-यह जानना मनुष्य
के लिए आवश्यक नही है | केवल इतना ही मानना आवश्यक हैं कि परमात्मा है और वह मेरा
है |ईश्वर को हम जानते नही और माने बिना रह सकते नही | ‘’हमारी सत्ता ईश्वर के
होने में प्रत्यक्ष प्रमाण है’’ | जब मनुष्य अपनी आवश्यकता कि पूर्ति न तो स्वय कर
सक्ता है और न उसकी पूर्ति संसार कर सकता है, तब वह स्वतः भगवान कि और खिचता
है,जिसको उसने देखा नही है प्रत्युत सुना है | परमात्मा अद्वितीय है,सदा
है,सर्वसमर्थ है,सर्वज्ञ है,सर्व-सुह्रद् है, परम दयालु है,सभी का हैऔर सब जगह है
| परमात्मा कि प्राप्ति क्रिया और प्रदार्थ के द्वारा नही होती ,प्रत्युत क्रिया व्
प्रदार्थ के त्याग से अपने द्वारा होती है | जो न तो भगवान पर विश्वास करता है,और न
शरीर संसार पर विश्वास करता है प्रत्युत अपने आप पर विश्वास करता है ,वह ज्ञान योग
का साधक हो जाता है | ऐसा साधक “मै कौन हू “ इसकी खोज करता है |मैं कि खोज करते-
करते मैं मिट जाता है और ‘है’ रह जाता है |
(अधिक विस्तार से जानने के लिये देखे पुस्तक मानव मात्र के कल्याण के
लिये –स्वामी रामसुखदासजी)
Monday, 17 February 2014
केजरीवाल का इस्तीफा - आमजन के लिए अप्रत्याशित व अप्रमाणिक
केजरीवाल जी के समक्ष ऐसी किसी भी प्रकार की विषम परिस्थितयां नही थी ,जो उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर करती हो | उन्होंने स्वयं इसकी भूमिका तैयार की और इस्तीफा देकर सरकार गिरा दी | उन्होंनें दिल्ली की जनता की सेवा का सु-अवसर गंवा दिया |
उन्होंने मीडिया व जनता को स्वयं कहा –जनता की मांग बहुत छोटी-छोटी है और ये सरकारे उन्हें भी पुरा नही कर सकती | क्या दिल्ली प्रदेश का मुख्यमंत्री भी उन मांगो को पुरा नही कर सका ? या तो स्वयं उनकी पार्टी में या उनकी सरकार की कैबिनेट में ही उन्हें कोई दिक्कत आई होगी, सरकार चलाने में; या फिर वह कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षी हो गए; या उनके आस-पास अति महत्वाकांक्षी लोगो का जमावड़ा हो गया है | असलियत जनता के सामने देर-सबेर आ ही जाएगी | आज आम आदमी ही सबसे ज्यादा व्यथित हुआ है क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा सब उसका ही नाम लेकर हो रहा है |
आप कितनी ही बडी महत्वकांक्षा रखिए,कितनी ही बडी पार्टी बनाइए ,कितना ही धन इकट्ठा करिए हमें कोई एतराज नही | आप जानो आपका काम ; पर ये सब गरीब आम-आदमी की नाम पर तो मत करिए | मै भी आम-आदमी हूँ, तकलीफ होती हैं |
उन्होंने मीडिया व जनता को स्वयं कहा –जनता की मांग बहुत छोटी-छोटी है और ये सरकारे उन्हें भी पुरा नही कर सकती | क्या दिल्ली प्रदेश का मुख्यमंत्री भी उन मांगो को पुरा नही कर सका ? या तो स्वयं उनकी पार्टी में या उनकी सरकार की कैबिनेट में ही उन्हें कोई दिक्कत आई होगी, सरकार चलाने में; या फिर वह कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षी हो गए; या उनके आस-पास अति महत्वाकांक्षी लोगो का जमावड़ा हो गया है | असलियत जनता के सामने देर-सबेर आ ही जाएगी | आज आम आदमी ही सबसे ज्यादा व्यथित हुआ है क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा सब उसका ही नाम लेकर हो रहा है |
आप कितनी ही बडी महत्वकांक्षा रखिए,कितनी ही बडी पार्टी बनाइए ,कितना ही धन इकट्ठा करिए हमें कोई एतराज नही | आप जानो आपका काम ; पर ये सब गरीब आम-आदमी की नाम पर तो मत करिए | मै भी आम-आदमी हूँ, तकलीफ होती हैं |
Friday, 7 February 2014
सरकारी नीतियों में सामाजिक विषमता का बीजांकुर
प्रधनामंत्री जी ने हाल ही में सातवें वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दी है | क्या यह भी वोट बैंक राजनीति का हिस्सा हैं ? आईए विमर्श करे |
देर-सबेर सातवाँ वेतन आयोग भी अपनी सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट देगा | उसे बिना सोचे लागु भी किया जायेगा | इससे पहले के आम चुनाव से पहले छ्ठे वेतन आयोग की सिफारीश लागू की गयी थी | जिसके कारण सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान में चार से पांच गुणा की बढ़ोतरी हुई | राज्य सरकारों को भी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने पड़े | विकास की दौड़ में शामिल होने वाली सरकारों के लिए यह भार अधिक था |परिणाम स्वरूप बड़े पैमाने परकर्मचारियों की छटनी शुरू हुई | सरकारे ठेकेदारी प्रथा की तरह काम करने लगी | अनुबंध के आधार पर कर्मचारी भर्ती किये जाने लगे | प्राइवेट सेक्टर भी इस बोझ तले दब गया | उसे भी सरकारी व समाजिक दबाब में वेतनमान बढाने पड़े | इस कारण उन्होंने भी छटनी शुरू करदी | अब वे भी क्या करें, जैसे-तैसे उद्योग तो चलाना हें | उम्र के दूसरे पड़ाव पर अगर कोई आप से कहे, भाई तेरे लिए अब मेरे पास काम नही तो सोचिये क्या किजीएगा | असंगठित क्षेत्र की तो बात ही मत करिये वरना रोना आ जायेगा | उन सरकारी नीतियों के लिये क्या कहेंगें ‘जिसके कारण हमारे अपने ही अपनों का शोषण करने को मजबूर हो जाये‘ |
अब आते हें कार्यपद्धति पर – क्या वेतन की बढ़ोतरी के साथ सरकारी काम-काज में कर्मचारियों की कार्यशैली में सुधार आया ? इसका उत्तर शायद ही कोई हाँ में दे सकता हैं | सरकारी स्कुल-कोलेज कोई रिजल्ट नही देते | स्वास्थ्य सेवाओं के लिये निजी अस्पतालों का मुंह ताकना पड़ता हैं | यह अकर्मण्यता चारो और नजर आती हैं | इसे आप सिस्टम का फेलियर कहकर पल्ला-झाड सकते हैं,तो फिर वेतनमान में इतनी बड़ी बढ़ोतरी क्यों ?
चारो और से उठती सरकारी नौकरियों में आरक्षण की माँग का एक कारण यह भी है, अच्छा वेतन हो और करना कुछ भी न पड़े तो कौन नही चाहेगा सरकारी नौकरी |आज किसी भी सरकारी कर्मचारी से हाल-चाल पूछो तो यही कहेगा के भाई मौज हैं | एक तरफ थोड़ा करके भी मौज ही मौज और दूसरी तरफ दिन रात मेहनत करके भी पेट न भरने की स्थिति | क्या हमनें इस समाजिक विषमता को पाट लिया है ? फिर यह सातवाँ वेतन आयोग किसलिए ?
मेरा यह मत भी नही के वेतनवृद्धि न की जाए परन्तु उसकी कोई तो कसौटी होनी चाहिए | जो लोग अधिक कार्य करना चाहते है उन्हें अधिक वेतन दिया जा सकता है | जिससे कार्य क्षमता का विस्तार हो ताकि सरकारी कार्यालयो में धुल फांकती फाईलो को जल्दी निपटाया जा सके |
अब ज्यादा रूपया पास था | अत्याधिक भौतिकवादी सुविधा की लालसा जगी | जिसके कारण कच्चे-माल के दाम बेतहाशा बढे और उससे भी ज्यादा उत्पादन लागत बढ़ गयी | ये महगांई बढ़ने का बड़ा कारण बन गयें, जो सुरसा के मुंह की तरह बडती चली गयी | आम आदमी बदहाल हो गया | पहले समस्या पैदा की गयी फिर उसे खत्म करने में एडी-चोटी का जोर लगाया गया | ऊपर से नारा दिया जा रहा हैं, हमारे राज में गरीबी कम हो गईं | सामाजिक विषमता कितनी बढ़ी , इसकी कोई चर्चा तक नही | हम सभी को इस विषय पर गम्भीर चिन्तन करना होगा | आज जरूरत है वीतरागी होने की | जो जहाँ है वह वहाँ से ही अगर ठीक कार्य करें तो हम बहुत सी समस्याओं का समाधान पा जायेगे |
कुछ विचार रोजगार गारंटी योजना पर हो जाए | नरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जो पैसा दिया गया कुछ तो वह भ्रष्ट तन्त्र की जेब में चला गया ,कुछ जमीन की मिट्टी इधर से उधर करने में | आम जन-जीवन में कोई बदलाव नही हुआ | अच्छा होता रोजगार गारंटी योजना का नाम प्रशिक्षण व रोजगार गारंटी योजना होता | जिससे प्रशिक्षित व स्वावलंबन रोजगारोन्मुखी नई पौध तैयार होती | आज हमारे उद्योग प्रशिक्षित पेशेवरो की भारी कमी का शिकार हैं | अगर सही दिशा में सोचा जाए तो यह स्थिति बदल सकती है | क्यों न हम अगले पांच वर्षों के लिए प्रशिक्षण से ही रोजगार की शुरुआत मान ले | उद्योग सेक्टर की मदद से इस पर बड़ा काम किया जा सकता है | जिससे दोनों और की समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है |
देर-सबेर सातवाँ वेतन आयोग भी अपनी सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट देगा | उसे बिना सोचे लागु भी किया जायेगा | इससे पहले के आम चुनाव से पहले छ्ठे वेतन आयोग की सिफारीश लागू की गयी थी | जिसके कारण सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान में चार से पांच गुणा की बढ़ोतरी हुई | राज्य सरकारों को भी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने पड़े | विकास की दौड़ में शामिल होने वाली सरकारों के लिए यह भार अधिक था |परिणाम स्वरूप बड़े पैमाने परकर्मचारियों की छटनी शुरू हुई | सरकारे ठेकेदारी प्रथा की तरह काम करने लगी | अनुबंध के आधार पर कर्मचारी भर्ती किये जाने लगे | प्राइवेट सेक्टर भी इस बोझ तले दब गया | उसे भी सरकारी व समाजिक दबाब में वेतनमान बढाने पड़े | इस कारण उन्होंने भी छटनी शुरू करदी | अब वे भी क्या करें, जैसे-तैसे उद्योग तो चलाना हें | उम्र के दूसरे पड़ाव पर अगर कोई आप से कहे, भाई तेरे लिए अब मेरे पास काम नही तो सोचिये क्या किजीएगा | असंगठित क्षेत्र की तो बात ही मत करिये वरना रोना आ जायेगा | उन सरकारी नीतियों के लिये क्या कहेंगें ‘जिसके कारण हमारे अपने ही अपनों का शोषण करने को मजबूर हो जाये‘ |
अब आते हें कार्यपद्धति पर – क्या वेतन की बढ़ोतरी के साथ सरकारी काम-काज में कर्मचारियों की कार्यशैली में सुधार आया ? इसका उत्तर शायद ही कोई हाँ में दे सकता हैं | सरकारी स्कुल-कोलेज कोई रिजल्ट नही देते | स्वास्थ्य सेवाओं के लिये निजी अस्पतालों का मुंह ताकना पड़ता हैं | यह अकर्मण्यता चारो और नजर आती हैं | इसे आप सिस्टम का फेलियर कहकर पल्ला-झाड सकते हैं,तो फिर वेतनमान में इतनी बड़ी बढ़ोतरी क्यों ?
चारो और से उठती सरकारी नौकरियों में आरक्षण की माँग का एक कारण यह भी है, अच्छा वेतन हो और करना कुछ भी न पड़े तो कौन नही चाहेगा सरकारी नौकरी |आज किसी भी सरकारी कर्मचारी से हाल-चाल पूछो तो यही कहेगा के भाई मौज हैं | एक तरफ थोड़ा करके भी मौज ही मौज और दूसरी तरफ दिन रात मेहनत करके भी पेट न भरने की स्थिति | क्या हमनें इस समाजिक विषमता को पाट लिया है ? फिर यह सातवाँ वेतन आयोग किसलिए ?
मेरा यह मत भी नही के वेतनवृद्धि न की जाए परन्तु उसकी कोई तो कसौटी होनी चाहिए | जो लोग अधिक कार्य करना चाहते है उन्हें अधिक वेतन दिया जा सकता है | जिससे कार्य क्षमता का विस्तार हो ताकि सरकारी कार्यालयो में धुल फांकती फाईलो को जल्दी निपटाया जा सके |
अब ज्यादा रूपया पास था | अत्याधिक भौतिकवादी सुविधा की लालसा जगी | जिसके कारण कच्चे-माल के दाम बेतहाशा बढे और उससे भी ज्यादा उत्पादन लागत बढ़ गयी | ये महगांई बढ़ने का बड़ा कारण बन गयें, जो सुरसा के मुंह की तरह बडती चली गयी | आम आदमी बदहाल हो गया | पहले समस्या पैदा की गयी फिर उसे खत्म करने में एडी-चोटी का जोर लगाया गया | ऊपर से नारा दिया जा रहा हैं, हमारे राज में गरीबी कम हो गईं | सामाजिक विषमता कितनी बढ़ी , इसकी कोई चर्चा तक नही | हम सभी को इस विषय पर गम्भीर चिन्तन करना होगा | आज जरूरत है वीतरागी होने की | जो जहाँ है वह वहाँ से ही अगर ठीक कार्य करें तो हम बहुत सी समस्याओं का समाधान पा जायेगे |
कुछ विचार रोजगार गारंटी योजना पर हो जाए | नरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जो पैसा दिया गया कुछ तो वह भ्रष्ट तन्त्र की जेब में चला गया ,कुछ जमीन की मिट्टी इधर से उधर करने में | आम जन-जीवन में कोई बदलाव नही हुआ | अच्छा होता रोजगार गारंटी योजना का नाम प्रशिक्षण व रोजगार गारंटी योजना होता | जिससे प्रशिक्षित व स्वावलंबन रोजगारोन्मुखी नई पौध तैयार होती | आज हमारे उद्योग प्रशिक्षित पेशेवरो की भारी कमी का शिकार हैं | अगर सही दिशा में सोचा जाए तो यह स्थिति बदल सकती है | क्यों न हम अगले पांच वर्षों के लिए प्रशिक्षण से ही रोजगार की शुरुआत मान ले | उद्योग सेक्टर की मदद से इस पर बड़ा काम किया जा सकता है | जिससे दोनों और की समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है |
Wednesday, 29 January 2014
जैन बंधुओ को अल्पसंख्यक का दर्जा धर्म-दर्शन के विरुद्ध
भारत देश में धर्म दर्शन का जितना विकास हुआ ,शायद ही अन्यत्र हुआ हो | भारतीय दार्शनिक तो सत्य की खोज के पथिक है | सत्य एक था ,सत्य एक है और सत्य एक ही रहेगा | चाहे दर्शन अनेक हो .परन्तु सत्य –भाव सबका एक समान है| सबका उद्देश्य है मोक्ष प्राप्त करना जो इस बात का प्रमाण भी है, भारतीय दर्शन समन्वय और समता का प्रतीक है |
अल्पसंख्यकवाद अलगाव यानि विषमता को जन्म देता है | आचार्यश्री महाप्रज्ञजी कहते है – मन की विषमता व्यवहारिक जगत में अनेक विषमताओं को जन्म देती है | व्यवहार ओर सिद्धांत की दुरी अवितराग मनुष्य की सहज प्रवर्ति है | बहुत लोग उस दुरी को पाटने का प्रयत्न ही नहीं करते| कुछ लोग उस दिशा में प्रयत्न करते है ,पर लक्ष्य बिंदु तक पहुचने में बहुत लंबा समय लग जाता है |आर्थिक विषमता मानसिक विषमता की एक निष्पति है | समतावादी चेतना का विकास हुए बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है | सब जीवो की समता की दुहाई देने वाला अपने लिए अतिरिक्त सुविधा चाहता है ओर अतिरिक्त सुविधा के अतिरिक्त संसाधन | इसी तरह जातिगत विषमता की पृष्ठभूमि में भी मानसिक विषमता पल रही है | व्यक्ति के मन में छिपा हुआ अहंकार अपनी उच्चता के आयाम खोजता है | दूसरों की निम्नता के बिना उच्चता अर्थवान नहीं होती | इसीलिए वह जाति ,रंग आदि के माध्यम से मद का पोषण करता है | इसी से समाज में विषमता पनपती है |
अधिक विस्तार में जाना भारतीय चिन्तक-मनीषियो को सूर्य को दीपक दिखाने के समान है| जैन दार्शनिक इस अनापेक्षित अल्पसंख्यकवाद के कूटनीतिक चेहरे को पहचानने की कोशिश करंगे | साथ ही वे इस अल्पसंख्यकवाद के प्रतिरोधक होंगे | सुधिजन मेरी इस अल्प घृष्टता पर विचार अवश्य करे वरन् मुझे क्षमा अवश्य प्रदान करे |
विशेष –
मेरा ध्यान इस ओर तब गया जब किसी परिचित बंधू ने कहा - ' सुना है जैन बंधुओ को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया है ' | इसमें कौन –से जैन होंगे श्वेताम्बर या दिगम्बर ? मै इतना ही कह सका मुझे जानकारी नहीं है |
परन्तु उसके इस प्रश्न से मुझे लगा,जैसे कोई मेरे शरीर को पूरी शक्ति से जकड रहा है ओर प्राण निकालने की कोशिश में है |
पहले सिख बंधुओ को अल्पसंख्यक कहा गया और अब जैन बंधुओ को | अब प्रश्न यह उठता है, फिर बहुसंख्यक कौन ? आखिर बहुसंख्यक की परिभाषा क्या है ?
मेरे इस लेख की प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस उद्द्घोष में हुई है – हिन्दू भाव को जब-जब भूले आई विपत महान ,भाई खोये धरती खोई मिटे धर्म संस्थान | प्रस्तुत लेख का स्रोत श्रीमान् शम्भू जी पटवा द्वारा सम्पादित पुस्तक विचार और निर्विचार से प्रेरित है |
अल्पसंख्यकवाद अलगाव यानि विषमता को जन्म देता है | आचार्यश्री महाप्रज्ञजी कहते है – मन की विषमता व्यवहारिक जगत में अनेक विषमताओं को जन्म देती है | व्यवहार ओर सिद्धांत की दुरी अवितराग मनुष्य की सहज प्रवर्ति है | बहुत लोग उस दुरी को पाटने का प्रयत्न ही नहीं करते| कुछ लोग उस दिशा में प्रयत्न करते है ,पर लक्ष्य बिंदु तक पहुचने में बहुत लंबा समय लग जाता है |आर्थिक विषमता मानसिक विषमता की एक निष्पति है | समतावादी चेतना का विकास हुए बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है | सब जीवो की समता की दुहाई देने वाला अपने लिए अतिरिक्त सुविधा चाहता है ओर अतिरिक्त सुविधा के अतिरिक्त संसाधन | इसी तरह जातिगत विषमता की पृष्ठभूमि में भी मानसिक विषमता पल रही है | व्यक्ति के मन में छिपा हुआ अहंकार अपनी उच्चता के आयाम खोजता है | दूसरों की निम्नता के बिना उच्चता अर्थवान नहीं होती | इसीलिए वह जाति ,रंग आदि के माध्यम से मद का पोषण करता है | इसी से समाज में विषमता पनपती है |
अधिक विस्तार में जाना भारतीय चिन्तक-मनीषियो को सूर्य को दीपक दिखाने के समान है| जैन दार्शनिक इस अनापेक्षित अल्पसंख्यकवाद के कूटनीतिक चेहरे को पहचानने की कोशिश करंगे | साथ ही वे इस अल्पसंख्यकवाद के प्रतिरोधक होंगे | सुधिजन मेरी इस अल्प घृष्टता पर विचार अवश्य करे वरन् मुझे क्षमा अवश्य प्रदान करे |
विशेष –
मेरा ध्यान इस ओर तब गया जब किसी परिचित बंधू ने कहा - ' सुना है जैन बंधुओ को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया है ' | इसमें कौन –से जैन होंगे श्वेताम्बर या दिगम्बर ? मै इतना ही कह सका मुझे जानकारी नहीं है |
परन्तु उसके इस प्रश्न से मुझे लगा,जैसे कोई मेरे शरीर को पूरी शक्ति से जकड रहा है ओर प्राण निकालने की कोशिश में है |
पहले सिख बंधुओ को अल्पसंख्यक कहा गया और अब जैन बंधुओ को | अब प्रश्न यह उठता है, फिर बहुसंख्यक कौन ? आखिर बहुसंख्यक की परिभाषा क्या है ?
मेरे इस लेख की प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस उद्द्घोष में हुई है – हिन्दू भाव को जब-जब भूले आई विपत महान ,भाई खोये धरती खोई मिटे धर्म संस्थान | प्रस्तुत लेख का स्रोत श्रीमान् शम्भू जी पटवा द्वारा सम्पादित पुस्तक विचार और निर्विचार से प्रेरित है |
Thursday, 12 December 2013
समलैंगिकता को वैधानिक मान्यता क्यों ?
समलैंगिकता आखिर है क्या ? अगर यह दो मित्रों को एक साथ रहने कि
मान्यता है तो इसका वैधानिक मान्यता से क्या तात्पर्य है ? यदि यह मित्रता से अधिक
कुछ है तो यह अप्राकृतिक यौनाचार हुआ | अप्राकृतिक यौनाचार स्त्री व पुरुष के
संबंधो का अतिक्रमण करता है | यह स्वस्थ समाज के मापदंडो को भी प्रभावित करता है |
कल कोई व्याभिचारी यह कहे के यह शरीर मेरा है, मै इसका कुछ भी उपयोग
करूँ | तो क्या यह किसी दूसरे के अधिकारों को अतिक्रमण नहीं हुआ ? फिर समलैंगिकता
को वैधानिक मान्यता क्यों ?
एक विकृत व बीमार मानसिकता में भटके लोगो को सही रास्ता दिखाना हम सब
का कर्तव्य है | इसे मानवाधिकारों के हनन का मामला नहीं कहा जा सकता | अगर यह शंका
होती है कि पुलिस को किसी के भी बेडरूम में झांकने का अधिकार मिल जाएगा तो इस शंका
का समाधान जरुरी है |
यह कहन अभी गलत है कि हम 2013 में 1860 को दोहरा रहे है | फिर 1860 ही
अच्छा, जो सामाजिक इकाई को जोड़ने का काम करता है | जरुरी नहीं है कि हम पश्चिम का
अनुकरण करे | क्या हम भारतीय पश्चिम को सही रास्ता नहीं दिखा सकते ?
Subscribe to:
Posts (Atom)

