Friday, 7 February 2014

सरकारी नीतियों में सामाजिक विषमता का बीजांकुर

प्रधनामंत्री जी ने हाल ही में सातवें वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दी है | क्या यह भी वोट बैंक राजनीति का हिस्सा हैं ? आईए विमर्श करे |

देर-सबेर सातवाँ वेतन आयोग भी अपनी सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट देगा | उसे बिना सोचे लागु भी किया जायेगा | इससे पहले के आम चुनाव से पहले छ्ठे वेतन आयोग की सिफारीश लागू की गयी थी | जिसके कारण सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान में चार से पांच गुणा की बढ़ोतरी हुई | राज्य सरकारों को भी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने पड़े | विकास की दौड़ में शामिल होने वाली सरकारों के लिए यह भार अधिक था  |परिणाम स्वरूप बड़े पैमाने परकर्मचारियों की छटनी शुरू हुई | सरकारे ठेकेदारी प्रथा की तरह काम करने लगी | अनुबंध के आधार पर कर्मचारी भर्ती किये जाने लगे | प्राइवेट सेक्टर भी इस बोझ तले दब गया | उसे भी सरकारी व समाजिक दबाब में वेतनमान बढाने पड़े | इस कारण उन्होंने भी छटनी शुरू करदी | अब वे भी क्या करें, जैसे-तैसे उद्योग तो चलाना हें | उम्र के दूसरे पड़ाव पर अगर कोई आप से कहे, भाई तेरे लिए अब मेरे पास काम नही तो सोचिये क्या किजीएगा | असंगठित क्षेत्र की तो बात ही मत करिये वरना रोना आ जायेगा | उन सरकारी नीतियों के लिये क्या कहेंगें ‘जिसके कारण हमारे अपने ही अपनों का शोषण करने को मजबूर हो जाये‘ |

अब आते हें कार्यपद्धति पर – क्या वेतन की बढ़ोतरी के साथ सरकारी काम-काज में कर्मचारियों की कार्यशैली में सुधार आया ? इसका उत्तर शायद ही कोई हाँ में दे सकता हैं | सरकारी स्कुल-कोलेज कोई रिजल्ट नही देते | स्वास्थ्य सेवाओं के लिये निजी अस्पतालों का मुंह ताकना पड़ता हैं | यह अकर्मण्यता चारो और नजर आती हैं | इसे आप सिस्टम का फेलियर कहकर पल्ला-झाड सकते हैं,तो फिर वेतनमान में इतनी बड़ी बढ़ोतरी क्यों ?

चारो और से उठती सरकारी नौकरियों में आरक्षण की माँग का एक कारण यह भी है, अच्छा वेतन हो और करना कुछ भी न पड़े तो कौन नही चाहेगा सरकारी नौकरी |आज किसी भी सरकारी कर्मचारी से हाल-चाल पूछो तो यही कहेगा के भाई मौज हैं | एक तरफ थोड़ा करके भी मौज ही मौज और दूसरी तरफ दिन रात मेहनत करके भी पेट न भरने की स्थिति | क्या हमनें इस समाजिक विषमता को पाट लिया है ? फिर यह सातवाँ वेतन आयोग किसलिए ?

मेरा यह मत भी नही के वेतनवृद्धि न की जाए परन्तु उसकी कोई तो कसौटी होनी चाहिए | जो लोग अधिक कार्य करना चाहते है उन्हें अधिक वेतन दिया जा सकता है | जिससे कार्य क्षमता का विस्तार हो ताकि सरकारी कार्यालयो में धुल फांकती फाईलो को जल्दी निपटाया जा सके |

अब ज्यादा रूपया पास था | अत्याधिक भौतिकवादी सुविधा की लालसा जगी | जिसके कारण कच्चे-माल के दाम बेतहाशा बढे और उससे भी ज्यादा उत्पादन लागत बढ़ गयी | ये महगांई बढ़ने का बड़ा कारण बन गयें, जो सुरसा के मुंह की तरह बडती चली गयी | आम आदमी बदहाल हो गया | पहले समस्या पैदा की गयी फिर उसे खत्म करने में एडी-चोटी का जोर लगाया गया | ऊपर से नारा दिया जा रहा हैं, हमारे राज में गरीबी कम हो गईं | सामाजिक विषमता कितनी बढ़ी , इसकी कोई चर्चा तक नही | हम सभी को इस विषय पर गम्भीर चिन्तन करना होगा | आज जरूरत है वीतरागी होने की | जो जहाँ है वह वहाँ से ही अगर ठीक कार्य करें तो हम बहुत सी समस्याओं का समाधान पा जायेगे |

कुछ विचार रोजगार गारंटी योजना पर हो जाए | नरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जो पैसा दिया गया कुछ तो वह भ्रष्ट तन्त्र की जेब में चला गया ,कुछ जमीन की मिट्टी इधर से उधर करने में | आम जन-जीवन में कोई बदलाव नही हुआ | अच्छा होता रोजगार गारंटी योजना का नाम प्रशिक्षण व रोजगार गारंटी योजना होता | जिससे प्रशिक्षित व स्वावलंबन रोजगारोन्मुखी नई पौध तैयार होती | आज हमारे उद्योग प्रशिक्षित पेशेवरो की भारी कमी का शिकार हैं | अगर सही दिशा में सोचा जाए तो यह स्थिति बदल सकती है | क्यों न हम अगले पांच वर्षों के लिए प्रशिक्षण से ही रोजगार की शुरुआत मान ले | उद्योग सेक्टर की मदद से इस पर बड़ा काम किया जा सकता है | जिससे दोनों और की समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है |

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