भ्रष्टाचार को समाप्त करना सरकारों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता हैं
| सरकारे अगर धर्म को साधकर ,चले तो यह हर समय संभव है | वरना चाहे लोकपाल लाया जाए
या जन-लोकपाल,समस्याओं का समाधान संभव नही होगा | क्योंकि पद को ग्रहण करनेवाला हर
व्यक्ति इसी देश का नागरिक होगा ;वह इसी समाज से चुना जायेगा |
प्रत्येक वस्तु धर्म के आधार पर टिकी है, उसका उपयोग धर्म के आधार पर
किया जायेगा तभी वह सार्थक परिणाम देगी और जीवन को उच्चतम शिखर पर ले जाएगी | समस्या
यह है, हमने धर्मनिरपेक्षता के ढोग में ,धर्म को ही जीवन से निकाल बाहर किया |
स्वामी रंगनाथानंद ने कहा के –वेदान्त दर्शन के आलोक में हम
‘’आध्यात्मिक’’ पद का सही अर्थ समझेंगे तो हम देखेंगे कि प्रबुद्ध नागरिकता मानव
के अध्यात्मिक विकास और जीवन की सार्थकता का एक अंग है | यह उस अध्यात्मिक विकास का
पहला सोपान है, धर्मनिरपेक्ष सोपान है जो महत्वपूर्ण और अनिवार्य है |आज हमे यह
आवश्यक सबक सीखना है | भगवद्गीता का सूक्ष्म अनुशीलन करने पर इस बात की सच्चाई
मालूम हो जाएगी | धर्म अध्यात्मिक विकास है | वह केवल कर्मकांड का कोई साधन नही | वह
मरने के बाद स्वर्ग पहुचने की लिए प्रवेश पत्र नही ! यह हम समझ लें तो यह सत्य भी
सहज विदित होगा कि नागरिकता मानव विकास का एक महत्वपूर्ण अविभाज्य अंग है |
मानव जीवन का राजनीतिक , आर्थिक ,सामाजिक अनुशासन ही वह आयाम है जिसे
धर्मनिरपेक्षता का क्षेत्र माना जाता है | आज हमे इन सभी क्षेत्रों में जी-जान से
काम करना है ;क्योंकि स्वामी विवेकानन्द जी ने गीता और उपनिषदों के दर्शन कि थाह
लगाने की वह अंतद्रष्टि दी है जिससे हम मानव-मानव के बीच और मानव-ईश्वर की बीच
संबंध स्थापित करने को अलग-अलग दर्शनों के रूप में नही ,एक ही दर्शन के रूप में
देख सकते है |
मानव में ईश्वर को देखना और मानव की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानना
इस अद्भुत दर्शन का सार है |
हमने ऐसी परिस्थितयों का निर्माण स्वयं ही कर लिया है की सज्जन व
दुर्जन व्यक्ति एक ही तुला में तोले जा रहें है |दुर्जन को सज्जनता की और उन्मुख
करना हमारा धर्म होना चाहिए | ईमानदारी से जीने वाले ठगे जाए यह अव्यवस्था है,जबकि
उन्हें तो पुरुस्कार मिलना चाहिए |’सब कुछ मेरा होना चाहिए,तथा दूसरों का क्या
होता है मुझे इसकी परवाह नही; यह मनोवर्ती बचकनी है | अधिकारों के मांग की
इतिश्री,कर्तव्यों के आरम्भ में होनी चाहिए |
क्या अधिकारों की मांग जारी रखना व कर्तव्यों को त्याग देना अराजकता
पैदा नही करता ?

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