मानव मात्र के कल्याण के लिये और समाज कल्याण के लिये गीता –ज्ञान का
सन्देश ,स्वामी रामसुखदासजी महाराज ने हमे बड़े ही सरल शब्दों में हमें समझया है | प्रस्तुत
लेख में- आज देश –काल व समाज में हमारी परिस्थितियों ,व हमारी समस्याओ के निराकरण
का रास्ता दिखाई पड़ता है | जिज्ञासु इस लेख को अवश्य पढ़े व ,चिंतन-मनन करे|
योगस्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयो विधित्सया ।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्य के लिए मैने तीनों योग बताये
है-ज्ञानयोग ,कर्मयोग और भग्तियोग | इन तीनों के सिवाय कल्याण का मार्ग नही है |
किसी आकृति विशेष का नाम मनुष्य नही,प्रत्युत मनुष्य वह है,जिसमें
सत् और असत् तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक हो | शरीर तो केवल कर्म-सामग्री है,
जिसका उपयोग केवल दूसरों की सेवा करने में ही है |
प्रत्येक मनुष्य वास्तव में साधक है |परमात्माप्राप्ति शरीर को नही
होती,प्रत्युत साधक को होती है | साधक अशरीरी होता है | उदहारणतः- मैं स्त्री
हूँ,मैं पुरुष हूँ,या अन्य जो ,मैं और हूँ की मान्यताएं संसारिक व्यवहार( मर्यादा ) के लिए
तो ठीक,पर परमात्म-प्राप्ति में ये बाधक है|
‘’मनुष्य को परमात्मप्राप्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है |’’
मुक्ति की मांग (स्वयं की भूख ) ज्ञानयोग से,दुःखनिवृत्ति की मांग
कर्मयोग से और परमप्रेम की मांग भग्तियोग से पूरी होती है |
‘’भोगी व्यक्ति स्वयं भी दुःख पाता है और दूसरों को भी दुःख देता है;
क्योंकि दुःखी व्यक्ति ही दूसरों को दुःख देता है-यह सिद्धांत है |’’
ज्ञानयोग का मार्ग –पराधीनता को मिटाने के लिए निष्काम होना बहुत
आवश्यक है |ममता के कारण शरीर,समाज,परिवार आदि की सेवा में बाधा ही लगती है |’’
भोग और संग्रह करना ही प्राप्त वस्तुओं का दुरुपयोग हैऔर उनकों दूसरों की सेवा में
लगाना ही सदुपयोग है |’’
कर्ता निष्काम हुए बिना कर्तव्य-कर्म का पालन नही होता और
कर्तव्य-कर्म का पालन हुए बिना प्राप्त परिस्थितियों का सदुपयोग नही होता |
कर्मयोग का मार्ग –मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने प्रति न्याय करे
और दूसरे के प्रति क्षमा-भाव रखे | ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी |चेतन अमल सहज सुख रासी
||
दूसरे का बुरा करनेवाला, बुरा चाहनेवाला दूसरे पर शासन तो कर सकता
है,पर सेवा नही कर सकता | समाज कि उन्नति सेवक के द्वारा होती है,शासक के द्वारा
नही |जो दूसरे का अधिकार है, वही हमारा कर्तव्य है | समाज में ज्यों-ज्यों अधिकार
पाने कि लालसा बढती जाती है,त्यों-ही-त्यों लोग अपने कर्तव्यों से हटते जाते
है,जिससे समाज में संघर्ष पैदा हो जाता है |
भग्तियोग का मार्ग –वह परमात्मा कैसा है,कैसा नही है-यह जानना मनुष्य
के लिए आवश्यक नही है | केवल इतना ही मानना आवश्यक हैं कि परमात्मा है और वह मेरा
है |ईश्वर को हम जानते नही और माने बिना रह सकते नही | ‘’हमारी सत्ता ईश्वर के
होने में प्रत्यक्ष प्रमाण है’’ | जब मनुष्य अपनी आवश्यकता कि पूर्ति न तो स्वय कर
सक्ता है और न उसकी पूर्ति संसार कर सकता है, तब वह स्वतः भगवान कि और खिचता
है,जिसको उसने देखा नही है प्रत्युत सुना है | परमात्मा अद्वितीय है,सदा
है,सर्वसमर्थ है,सर्वज्ञ है,सर्व-सुह्रद् है, परम दयालु है,सभी का हैऔर सब जगह है
| परमात्मा कि प्राप्ति क्रिया और प्रदार्थ के द्वारा नही होती ,प्रत्युत क्रिया व्
प्रदार्थ के त्याग से अपने द्वारा होती है | जो न तो भगवान पर विश्वास करता है,और न
शरीर संसार पर विश्वास करता है प्रत्युत अपने आप पर विश्वास करता है ,वह ज्ञान योग
का साधक हो जाता है | ऐसा साधक “मै कौन हू “ इसकी खोज करता है |मैं कि खोज करते-
करते मैं मिट जाता है और ‘है’ रह जाता है |
(अधिक विस्तार से जानने के लिये देखे पुस्तक मानव मात्र के कल्याण के
लिये –स्वामी रामसुखदासजी)
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