भारत देश में धर्म दर्शन का जितना विकास हुआ ,शायद ही अन्यत्र हुआ हो | भारतीय दार्शनिक तो सत्य की खोज के पथिक है | सत्य एक था ,सत्य एक है और सत्य एक ही रहेगा | चाहे दर्शन अनेक हो .परन्तु सत्य –भाव सबका एक समान है| सबका उद्देश्य है मोक्ष प्राप्त करना जो इस बात का प्रमाण भी है, भारतीय दर्शन समन्वय और समता का प्रतीक है |
अल्पसंख्यकवाद अलगाव यानि विषमता को जन्म देता है | आचार्यश्री महाप्रज्ञजी कहते है – मन की विषमता व्यवहारिक जगत में अनेक विषमताओं को जन्म देती है | व्यवहार ओर सिद्धांत की दुरी अवितराग मनुष्य की सहज प्रवर्ति है | बहुत लोग उस दुरी को पाटने का प्रयत्न ही नहीं करते| कुछ लोग उस दिशा में प्रयत्न करते है ,पर लक्ष्य बिंदु तक पहुचने में बहुत लंबा समय लग जाता है |आर्थिक विषमता मानसिक विषमता की एक निष्पति है | समतावादी चेतना का विकास हुए बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है | सब जीवो की समता की दुहाई देने वाला अपने लिए अतिरिक्त सुविधा चाहता है ओर अतिरिक्त सुविधा के अतिरिक्त संसाधन | इसी तरह जातिगत विषमता की पृष्ठभूमि में भी मानसिक विषमता पल रही है | व्यक्ति के मन में छिपा हुआ अहंकार अपनी उच्चता के आयाम खोजता है | दूसरों की निम्नता के बिना उच्चता अर्थवान नहीं होती | इसीलिए वह जाति ,रंग आदि के माध्यम से मद का पोषण करता है | इसी से समाज में विषमता पनपती है |
अधिक विस्तार में जाना भारतीय चिन्तक-मनीषियो को सूर्य को दीपक दिखाने के समान है| जैन दार्शनिक इस अनापेक्षित अल्पसंख्यकवाद के कूटनीतिक चेहरे को पहचानने की कोशिश करंगे | साथ ही वे इस अल्पसंख्यकवाद के प्रतिरोधक होंगे | सुधिजन मेरी इस अल्प घृष्टता पर विचार अवश्य करे वरन् मुझे क्षमा अवश्य प्रदान करे |
विशेष –
मेरा ध्यान इस ओर तब गया जब किसी परिचित बंधू ने कहा - ' सुना है जैन बंधुओ को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया है ' | इसमें कौन –से जैन होंगे श्वेताम्बर या दिगम्बर ? मै इतना ही कह सका मुझे जानकारी नहीं है |
परन्तु उसके इस प्रश्न से मुझे लगा,जैसे कोई मेरे शरीर को पूरी शक्ति से जकड रहा है ओर प्राण निकालने की कोशिश में है |
पहले सिख बंधुओ को अल्पसंख्यक कहा गया और अब जैन बंधुओ को | अब प्रश्न यह उठता है, फिर बहुसंख्यक कौन ? आखिर बहुसंख्यक की परिभाषा क्या है ?
मेरे इस लेख की प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस उद्द्घोष में हुई है – हिन्दू भाव को जब-जब भूले आई विपत महान ,भाई खोये धरती खोई मिटे धर्म संस्थान | प्रस्तुत लेख का स्रोत श्रीमान् शम्भू जी पटवा द्वारा सम्पादित पुस्तक विचार और निर्विचार से प्रेरित है |
अल्पसंख्यकवाद अलगाव यानि विषमता को जन्म देता है | आचार्यश्री महाप्रज्ञजी कहते है – मन की विषमता व्यवहारिक जगत में अनेक विषमताओं को जन्म देती है | व्यवहार ओर सिद्धांत की दुरी अवितराग मनुष्य की सहज प्रवर्ति है | बहुत लोग उस दुरी को पाटने का प्रयत्न ही नहीं करते| कुछ लोग उस दिशा में प्रयत्न करते है ,पर लक्ष्य बिंदु तक पहुचने में बहुत लंबा समय लग जाता है |आर्थिक विषमता मानसिक विषमता की एक निष्पति है | समतावादी चेतना का विकास हुए बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है | सब जीवो की समता की दुहाई देने वाला अपने लिए अतिरिक्त सुविधा चाहता है ओर अतिरिक्त सुविधा के अतिरिक्त संसाधन | इसी तरह जातिगत विषमता की पृष्ठभूमि में भी मानसिक विषमता पल रही है | व्यक्ति के मन में छिपा हुआ अहंकार अपनी उच्चता के आयाम खोजता है | दूसरों की निम्नता के बिना उच्चता अर्थवान नहीं होती | इसीलिए वह जाति ,रंग आदि के माध्यम से मद का पोषण करता है | इसी से समाज में विषमता पनपती है |
अधिक विस्तार में जाना भारतीय चिन्तक-मनीषियो को सूर्य को दीपक दिखाने के समान है| जैन दार्शनिक इस अनापेक्षित अल्पसंख्यकवाद के कूटनीतिक चेहरे को पहचानने की कोशिश करंगे | साथ ही वे इस अल्पसंख्यकवाद के प्रतिरोधक होंगे | सुधिजन मेरी इस अल्प घृष्टता पर विचार अवश्य करे वरन् मुझे क्षमा अवश्य प्रदान करे |
विशेष –
मेरा ध्यान इस ओर तब गया जब किसी परिचित बंधू ने कहा - ' सुना है जैन बंधुओ को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया है ' | इसमें कौन –से जैन होंगे श्वेताम्बर या दिगम्बर ? मै इतना ही कह सका मुझे जानकारी नहीं है |
परन्तु उसके इस प्रश्न से मुझे लगा,जैसे कोई मेरे शरीर को पूरी शक्ति से जकड रहा है ओर प्राण निकालने की कोशिश में है |
पहले सिख बंधुओ को अल्पसंख्यक कहा गया और अब जैन बंधुओ को | अब प्रश्न यह उठता है, फिर बहुसंख्यक कौन ? आखिर बहुसंख्यक की परिभाषा क्या है ?
मेरे इस लेख की प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस उद्द्घोष में हुई है – हिन्दू भाव को जब-जब भूले आई विपत महान ,भाई खोये धरती खोई मिटे धर्म संस्थान | प्रस्तुत लेख का स्रोत श्रीमान् शम्भू जी पटवा द्वारा सम्पादित पुस्तक विचार और निर्विचार से प्रेरित है |
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