किसी भी आम आदमी से अगर यह
पूछा जाए की कोमोडिटी मार्केट के बारे में आप क्या समझते है तो वह यही जबाब देगा
के अरे वही जो कम्प्यूटर पर सट्टा खेला जाता है | कितने ही
घर इसने बर्बाद कर दिए है, कितने ही व्यापारियों का
धंधा चौपट हो चुका है | भाई इससे दूर ही रहना, वरना
बर्बाद हो जाओगे ,इत्यादि | ऐसे ही जुमले व्यापारियों के बीच आपको सभी जगह सुनने को मिल जाएगे | यह
मार्केट ना ही तो आम व्यापारियों को फायदा पहुचाँ सकी और ना ही यह किसानों से जुड
सकी | फिर भी तकरीबन एक दशक से ऐसे ही चल रहा है | ऐसा
क्यों ?
मेरा स्वयं का अनुभव आपको
बताता हूँ क्योंकि भुगत-भोगी ज्यादा जानता है, तकरीबन सात-आठ साल पहले की
बात है मुझे भी कम्प्यूटर पर व्यपार में रूचि हुई | मैने २००
किवंटल कोई जिंस खरीदी ,पर कुछ दिन में उसमें तकरीबन ३०० रूपये का मंदा आ गया | मैने
अपने ब्रोकर से कहा कोई बात नही हम इसकी डिलीवरी ले लेते है | मेरे
ब्रोकर को भी डिलीवरी सिस्टम के बारे में पता नही था क्योंकि कभी किसी ने ऐसा कहा
ही नही | सो उसने भी जानने की कोशिश की ,उसने
मुझे बताया की यह तो बड़ा पेचीदगी भरा है ,अच्छा है
आप आपना सौदा काट लो एक्सपायरी नजदीक है नुकसान ज्यादा बड़ा हो सकता है , इस समय
नाजायज मंदा या नाजायज तेज कर देते है | मैने
पूछा ऐसा कौन लोग करते है ,तब उसने जबाब दिया भाई यह तो मुझे भी नही पता परन्तु ऐसा होता है | मेरे
सामने अजीब स्थिति थी ,मुझे वह नुकसान वही भुगतना पड़ा | उसके बाद
जैसा उसने कहा था वैसा ही हुआ उस जिंस में ५०० रूपये से ज्यादा
का मंदा आया ,मेरा नुकसान ज्यादा बड़ा हो सकता था | में
बैचेन था ,सोचा इसी से नुकसान कवर किया जाए और सारा काम छोड़ एक महीने तक सुबह
से लेकर शाम तक वहा बैठ कर उस व्यपार को देखना शुरू किया | मैने
पाया की वहा जो भी आ रहा है वह देकर ही जाता था | हार कर
उस ब्रोकर ने भी लोगों की गालियाँ खाकर वह काम ही बन्द कर दिया | मै बहुत दिनों तक सोचता रहा
जब इसमें यही नही पता के क्रेता कौन है और विक्रेता कौन तब ऐसी परिस्थीती का लाभ
ताकतवर व्यक्ति क्यों नही उठाएगा | क्योंकि
सारा कार्य केवल कागज पर ही तो होना है | खुद को
निकम्मा समझ और भाग्य को दोष देकर चुपचाप अपने घर बैठ गया | साथ ही
यह भी ध्यान आया की यह तो खुले आम सट्टेबाजी हो रही हैं ,वह भी
सरकार की नाक के नीचे | क्या आज भी उन परिस्थितियों में बदलाव हुआ है, यह जानने
के लिए मै एक शेयर
ब्रोकर के पास गया और कोमोडिटीज मार्केट के बारे में जानने की कोशिश की ,उसने
हंसते हुए कहा की हमारे D.P यानि मैन ब्रोकर कहते है की तुम्हारे शहर में अगर किसी ने लगातार
कम्प्यूटर पर व्यापार करके एक रुपया भी कमाया हो तो मुझे उसकी फोटो लाकर देना ,उसे मै कलयुग का भगवान मान कर
उसकी फोटो अपनी ब्रांच में लगा लुगा |
अभी तक मेरे पास संवाद का
कोई जरिया नही था सो आज ब्लॉग पर लेख -लिखकर डालने का मन कर आया | मै अपने आप को रोक नही सकता ,शायद कोई
सज्जन व्यक्ति इस लेख को पढ़कर आम आदमी की यह व्यथा सरकार तक पहुचा दे | क्योंकि
अच्छे दिन आ गये है | वैसे तो यह मेरा स्वयं का सोचने का नजरिया है ,जो सही
भी हो सकता है गलत भी | मै आम –आदमी
इसकी अधिक बारीकियों को तो नही जानता परन्तु ऊपर जो कुछ भी वर्णन किया है वह सत्य
है |
आइये अब यह विचार किया जाए
की क्या हो सकता है –
जहाँ तक मेरी जानकारी है अब
तक यह कहा गया की कमोडिटी मार्केट की यह स्कीम वाजपेयी जी की देन है ,यह
कुतर्क है | वाजपेयी जी ने कभी सोचा भी ना होगा की उनकी नेक-नीति का यह हर्ष किया
जाएगा | वाजपेयी जी किसान काल सेंटर बनाकर इसको किसानों से जोड़ना चाहते थे | वह चाहते
थे की पुरे देश में वेयरहाउसों की व्यापक श्रंखला बनाई जाए जहाँ किसान अपना अनाज
या उत्पाद रख सके | किसान काल सेंटर उनकों प्रमाणपत्र जारी करें | उसके बाद
किसान जब चाहे कम्प्युटर के जरिए अपना माल उचित मुल्य पर बेच सके | परन्तु
इस दौरान सरकार बदल गयी और जो हुआ वह सबके सामने है | अब
कोमोडिटी मार्केट की रूप-रेखा व उसके मायने ही बदल गये है | जरूरत है
बदले परिपेक्ष्य में व्यापक विमर्श की ताकि व्यपार के इस तरीके को ईमानदारी से
चलाया जाए | इसी में सबका भला है , क्योंकि
जहाँ तक मुझे पता हैं इन एक्सचेंजो का कारोबार सिमट कर १५-२० प्रतिशत ही रह गया
हैं | आईए इसके चरणबद्ध विकास पर विमर्श किया जाए –
पहला चरण – १ .
पहचान सबसे जरूरी कार्य है– इस
क्षेत्र में कार्य करने वाले कोन हैं , यानि
क्रेता और विक्रेता |
२.सभी उत्पादों की अलग-अलग श्रेणियाँ बनाई जाए जैसे- बहुमुल्य धातु
वर्ग ,लोह व अलोह धातु वर्ग ,अखाद्य
तेल ,खाद्य तेल वा तिलहन वर्ग , धान्य
वर्ग व दाल-दलहन ,किरयाना से सम्बन्द, शाक वर्ग व अन्य | इन सभी
वर्गों को अलग-अलग विभिन्न कम्पनियों में सूचीबद्ध किया जाए | क्योंकि
जो कम्पनी लोहे का व्यपार करती है उसे आलू या मसाले से क्या लेना या अन्य कोई भी
असंगत उत्पाद |
३.कम्पनी सुनिचित करके सरकार को बताये की वह फला वर्ग के उत्पाद का
व्यपार करना चाहती है | कम्पनियों को उसी आधार पर शेयर मार्किट की तरहा कोमोडिटी एक्सचेंजो
में लिस्टिंङ किया जाए | साथ ही कम्पनी गुणवत्ता का प्रमाणपत्र भी हासिल करें | कम्प्यूटर
पर कम्पनी के नाम सहित उत्पाद के क्रय- विक्रय की अनुमति
दिजाए |
४. कम्पनी के विभिन्न उत्पाद क्षेत्रों में कितने वेयर हॉउस है | क्योंकि
व्यपार तो उत्पाद हाथ में होगा तभी तो होगा | किसी भी
कम्पनी को किसी उत्पाद के उतने ही व्यपार की अनुमति दी जाए जितना उत्पाद उसके हाथ
में है, ऐसा ना हो स्टॉक से पांच गुणा काम हो रहा है | इसी कारण
नाजायज मंदा या तेज लाया जाता है | केवल
कागज पर व्यपार की अनुमति ना दी जाए |
५. सरकार शुरूआत में लिस्टिड कम्पनी को स्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए यह
छुट दे सकती है के वह देश में स्थनीय व्यपारी के साथ मिलकर विभिन्न मंडियों में
उत्पाद का भंडारण कर सके | कम्पनियां चाहे तो स्थानीय व्यपारियो के साथ मिलकर वेयर हॉउस का
निर्माण भी कर सकती है | कम्पनियों को भंडारण का पुरा ब्यौरा सरकार को देना जरूरी हो | इस
सम्बन्धी जरूरी जानकारी कम्पनी बेबसाईट पर आम निवेशको के लिए भी उपल्ब्ध रहें | इससे
डिलीवरी सिस्टम अपने आप मजबूत हो जाएगा |
६ .साथ ही सरकार यह भी ध्यान रखे के कोई कम्पनी किसी उत्पाद की कितनी
डिलीवरी करती है | हर तिमही में पेंडिग सौदौ को डिलवरी माना जाए और सरकार उसपर उचित
टेक्स लगाए | किसी भी हालत में पेंडिग सौदौ का बदला अगली तिमाही में ना हो | अगली
तिमाही में उत्पादों के भाव नये सिरे से शुरू किये जाए | इसमें
सरकार को उत्पादों के मुल्यों पर नजर रखने में सहूलियत होगी व उसकी आमदनी भी बढेगी
|
७.अगर कोई और टेक्निकल बिंदु रह गया हो तो उस पर चर्चा संभव हैं | अगर
कम्पनियां ईमानदारी से सही पहलुओ पर सरकार से संवाद कर सरकार की बात मानती है, तो उस
सिथति में सरकार चाहे तो इस क्षेत्र को विभिन्न चरणों में १००
प्रतिशत तक FDI को मंजूरी दे सकती है | क्योंकि
इसके बाद रिटेल में FDI की जरूरत ही नही रहेगी | यह
सिस्टम कम्पनियों ,छोटे-मंझोले कारोबारियों व किसानों के बीच सेतु का कार्य करेगा |
दूसरा चरण – १. जिस
तरह कम्पनीयों की पहचान आवश्यक है उसी तरहा आम निवेशक की पहचान जरूरी है | आम
निवेशक के लिए CST या TEN नम्बर अनिवार्य कर दिया जाए | इस तरहा
सट्टेबाजी पर लगाम लगाने में सहायता मिलेगी जो आम निवेशक के हित में रहेगा |
२.आम निवेशक को भी उन्ही वर्ग उत्पादों के क्रय-विक्रय की अनुमति दी
जाए ,जिसके लिए उसने सरकार से अनुमति प्राप्त की है |
तीसरा चरण – सरकार इस
सिस्टम से किसानों को सीधे या सोसायटियों के माद्यम से या फिर किसान काल सेंटर के
माद्यम से जोड़ सकती हैं |
सरकार चाहे क्रमबद्ध एक चरण
या तीनों चरणों पर एक साथ कार्य कर सकती है |
परिणाम – १.यह
सिस्टम सभी तरहा के व्यपार करने वालो को एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराएगा | व्यपार
में एक नयी स्पर्धा के लिए जगह बनाएगा |
२. यह सरकार खासतोर पर राज्य सरकारों के राजस्व में बढोतरी करने वाला
सिध्द होगा कयोकि ज्यों- ज्यों व्यपार में बढोतरी होगी अधिकतम व्यपार पक्के में
होना शुरु हो जाएगा | राज्य सरकार चाहे तो कृषि उत्पादों पर परचेज टेक्स लगा सकती है | परन्तु
उसके बाद उत्पाद बिना किसी अन्य प्रकार के टेक्स के पुरे देश में बिकने के लिए
उपलब्ध रहना चाहिए | इस व्यवस्था का सीधा फायदा सरकार व किसानों को होगा |
३.सरकार इस व्यवस्था के जरिए तुरन्त पता लगा सकेगी की देश में किस
उत्पाद की कमी होने वाली है, सरकार महंगाई को रोकने में
सफल साबित हो सकेगी अगर नही हुई तो भी तुरन्त पता लग जाएगा की सिस्टम में कही
गडबडी है |
४. रोजगार के अवसरों को
बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा |
५.अगर ईमानदारी से क्रमबद्ध विकास किया जाए तो यह कोमोडिटी
मार्केट अगले दश –पन्द्रह सालो में शेयर मार्केट से भी बड़ा मार्केट बन सकता है |
नोट- यह लेख हिन्दुस्थान
में ही व्यपार को ध्यान में रख-कर लिखा गया है | इससे
जुड़े विदेशी व्यपार या अन्य विदेशी व्यपार समूहों की लेखक कोई जानकारी नही रखता | इस पर
अलग से विमर्श किया जा सकता है | लेख के शुरू में जो टिप्पणी
मेरे द्वारा की गयी है, उससे मेरा आशय किसी पर भी व्यक्तिगत या या सामुहिक आक्षेप लगाना नही
है | अगर किसी को जरा भी ठेस लगी हो तो में हाथ जोड़-कर क्षमा मांगता हूँ |नेति-नेति

