Saturday, 31 May 2014

आम निवेशक की नजर में कोमोडिटीज मार्केट का सत्य | किस के नाम पर हो रहा है सारा कारोबार ? अच्छे दिन कैसे आए ?

किसी भी आम आदमी से अगर यह पूछा जाए की कोमोडिटी मार्केट के बारे में आप क्या समझते है तो वह यही जबाब देगा के अरे वही जो कम्प्यूटर पर सट्टा खेला जाता है | कितने ही घर इसने बर्बाद कर दिए है, कितने ही व्यापारियों का धंधा चौपट हो चुका है | भाई इससे दूर ही रहना, वरना बर्बाद हो जाओगे ,इत्यादि | ऐसे ही जुमले व्यापारियों के बीच आपको सभी जगह सुनने को मिल जाएगे | यह मार्केट ना ही तो आम व्यापारियों को फायदा पहुचाँ सकी और ना ही यह किसानों से जुड सकी | फिर भी तकरीबन एक दशक से ऐसे ही चल रहा है | ऐसा क्यों ?

मेरा स्वयं का अनुभव आपको बताता हूँ क्योंकि भुगत-भोगी ज्यादा जानता है, तकरीबन सात-आठ साल पहले की बात है मुझे भी कम्प्यूटर पर व्यपार में रूचि हुई | मैने २०० किवंटल कोई जिंस खरीदी ,पर कुछ दिन में उसमें तकरीबन ३०० रूपये का मंदा आ गया | मैने अपने ब्रोकर से कहा कोई बात नही हम इसकी डिलीवरी ले लेते है | मेरे ब्रोकर को भी डिलीवरी सिस्टम के बारे में पता नही था क्योंकि कभी किसी ने ऐसा कहा ही नही | सो उसने भी जानने की कोशिश की ,उसने मुझे बताया की यह तो बड़ा पेचीदगी भरा है ,अच्छा है आप आपना सौदा काट लो एक्सपायरी नजदीक है नुकसान ज्यादा बड़ा हो सकता है , इस समय नाजायज मंदा या नाजायज तेज कर देते है | मैने पूछा ऐसा कौन लोग करते है ,तब उसने जबाब दिया भाई यह तो मुझे भी नही पता परन्तु ऐसा होता है | मेरे सामने अजीब स्थिति थी ,मुझे वह नुकसान वही भुगतना पड़ा | उसके बाद जैसा उसने कहा था वैसा ही हुआ उस जिंस में ५०० रूपये से  ज्यादा का मंदा आया ,मेरा नुकसान ज्यादा बड़ा हो सकता था | में बैचेन था ,सोचा इसी से नुकसान कवर किया जाए और सारा काम छोड़ एक महीने तक सुबह से लेकर शाम तक वहा बैठ कर उस व्यपार को देखना शुरू किया | मैने पाया की वहा जो भी आ रहा है वह देकर ही जाता था  | हार कर उस ब्रोकर ने भी लोगों की गालियाँ खाकर वह काम ही बन्द कर दिया | मै बहुत दिनों तक सोचता रहा जब इसमें यही नही पता के क्रेता कौन है और विक्रेता कौन तब ऐसी परिस्थीती का लाभ ताकतवर व्यक्ति क्यों नही उठाएगा | क्योंकि सारा कार्य केवल कागज पर ही तो होना है | खुद को निकम्मा समझ और भाग्य को दोष देकर चुपचाप अपने घर बैठ गया | साथ ही यह भी ध्यान आया की यह तो खुले आम सट्टेबाजी हो रही हैं ,वह भी सरकार की नाक के नीचे | क्या आज भी उन परिस्थितियों में बदलाव हुआ है, यह जानने के लिए मै एक शेयर ब्रोकर के पास गया और कोमोडिटीज मार्केट के बारे में जानने की कोशिश की ,उसने हंसते हुए कहा की हमारे D.P यानि मैन ब्रोकर कहते है की तुम्हारे शहर में अगर किसी ने लगातार कम्प्यूटर पर व्यापार करके एक रुपया भी कमाया हो तो मुझे उसकी फोटो लाकर देना ,उसे मै कलयुग का भगवान मान कर उसकी फोटो अपनी ब्रांच में लगा लुगा |

अभी तक मेरे पास संवाद का कोई जरिया नही था सो आज ब्लॉग पर लेख -लिखकर डालने का मन कर आया | मै अपने आप को रोक नही सकता ,शायद कोई सज्जन व्यक्ति इस लेख को पढ़कर आम आदमी की यह व्यथा सरकार तक पहुचा दे | क्योंकि अच्छे दिन आ गये है | वैसे तो यह मेरा स्वयं का सोचने का नजरिया है ,जो सही भी हो सकता है गलत भी | मै आम आदमी इसकी अधिक बारीकियों को तो नही जानता परन्तु ऊपर जो कुछ भी वर्णन किया है वह सत्य है
आइये अब यह विचार किया जाए की क्या हो सकता है

जहाँ तक मेरी जानकारी है अब तक यह कहा गया की कमोडिटी मार्केट की यह स्कीम वाजपेयी जी की देन है ,यह कुतर्क है | वाजपेयी जी ने कभी सोचा भी ना होगा की उनकी नेक-नीति का यह हर्ष किया जाएगा | वाजपेयी जी किसान काल सेंटर बनाकर इसको किसानों से जोड़ना चाहते थे | वह चाहते थे की पुरे देश में वेयरहाउसों की व्यापक श्रंखला बनाई जाए जहाँ किसान अपना अनाज या उत्पाद रख सके | किसान काल सेंटर उनकों प्रमाणपत्र जारी करें | उसके बाद किसान जब चाहे कम्प्युटर के जरिए अपना माल उचित मुल्य पर बेच सके | परन्तु इस दौरान सरकार बदल गयी और जो हुआ वह सबके सामने है | अब कोमोडिटी मार्केट की रूप-रेखा व उसके मायने ही बदल गये है | जरूरत है बदले परिपेक्ष्य में व्यापक विमर्श की ताकि व्यपार के इस तरीके को ईमानदारी से चलाया जाए | इसी में सबका भला है , क्योंकि जहाँ तक मुझे पता हैं इन एक्सचेंजो का कारोबार सिमट कर १५-२० प्रतिशत ही रह गया हैं | आईए इसके चरणबद्ध विकास पर विमर्श किया जाए
पहला चरण १ . पहचान सबसे जरूरी कार्य  हैइस क्षेत्र में कार्य करने वाले कोन हैं , यानि क्रेता और विक्रेता |

            २.सभी उत्पादों की अलग-अलग श्रेणियाँ बनाई जाए जैसे- बहुमुल्य धातु वर्ग ,लोह व अलोह धातु वर्ग ,अखाद्य तेल ,खाद्य तेल वा तिलहन वर्ग , धान्य वर्ग व दाल-दलहन ,किरयाना से सम्बन्द, शाक वर्ग व अन्य | इन सभी वर्गों को अलग-अलग विभिन्न कम्पनियों में सूचीबद्ध किया जाए | क्योंकि जो कम्पनी लोहे का व्यपार करती है उसे आलू या मसाले से क्या लेना या अन्य कोई भी असंगत उत्पाद |

            ३.कम्पनी सुनिचित करके सरकार को बताये की वह फला वर्ग के उत्पाद का व्यपार करना चाहती है | कम्पनियों को उसी आधार पर शेयर मार्किट की तरहा कोमोडिटी एक्सचेंजो में लिस्टिंङ किया जाए | साथ ही कम्पनी गुणवत्ता का प्रमाणपत्र भी हासिल करें | कम्प्यूटर पर कम्पनी के नाम सहित उत्पाद के क्रय- विक्रय की अनुमति दिजाए |

            ४. कम्पनी के विभिन्न उत्पाद क्षेत्रों में कितने वेयर हॉउस है | क्योंकि व्यपार तो उत्पाद हाथ में होगा तभी तो होगा | किसी भी कम्पनी को किसी उत्पाद के उतने ही व्यपार की अनुमति दी जाए जितना उत्पाद उसके हाथ में है, ऐसा ना हो स्टॉक से पांच गुणा काम हो रहा है | इसी कारण नाजायज मंदा या तेज लाया जाता है | केवल कागज पर व्यपार की अनुमति ना दी जाए |

           ५. सरकार शुरूआत में लिस्टिड कम्पनी को स्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए यह छुट दे सकती है के वह देश में स्थनीय व्यपारी के साथ मिलकर विभिन्न मंडियों में उत्पाद का भंडारण कर सके | कम्पनियां चाहे तो स्थानीय व्यपारियो के साथ मिलकर वेयर हॉउस का निर्माण भी कर सकती है | कम्पनियों को भंडारण का पुरा ब्यौरा सरकार को देना जरूरी हो | इस सम्बन्धी जरूरी जानकारी कम्पनी बेबसाईट पर आम निवेशको के लिए भी उपल्ब्ध रहें | इससे डिलीवरी सिस्टम अपने आप मजबूत हो जाएगा |

            ६ .साथ ही सरकार यह भी ध्यान रखे के कोई कम्पनी किसी उत्पाद की कितनी डिलीवरी करती है | हर तिमही में पेंडिग सौदौ को डिलवरी माना जाए और सरकार उसपर उचित टेक्स लगाए | किसी भी हालत में पेंडिग सौदौ का बदला अगली तिमाही में ना हो | अगली तिमाही में उत्पादों के भाव नये सिरे से शुरू किये जाए | इसमें सरकार को उत्पादों के मुल्यों पर नजर रखने में सहूलियत होगी व उसकी आमदनी भी बढेगी |
            ७.अगर कोई और टेक्निकल बिंदु रह गया हो तो उस पर चर्चा संभव हैं | अगर कम्पनियां ईमानदारी से सही पहलुओ पर सरकार से संवाद कर सरकार की बात मानती है, तो उस सिथति में सरकार चाहे तो इस क्षेत्र को विभिन्न चरणों में  १०० प्रतिशत तक FDI को मंजूरी दे सकती है | क्योंकि इसके बाद रिटेल में FDI की जरूरत ही नही रहेगी | यह सिस्टम कम्पनियों ,छोटे-मंझोले कारोबारियों व किसानों के बीच सेतु का कार्य करेगा |                                                                                                                                                                                                                                        
दूसरा चरण १. जिस तरह कम्पनीयों की पहचान आवश्यक है उसी तरहा आम निवेशक की पहचान जरूरी है | आम निवेशक के लिए CST या TEN नम्बर अनिवार्य कर दिया जाए | इस तरहा सट्टेबाजी पर लगाम लगाने में सहायता मिलेगी जो आम निवेशक के हित में रहेगा |
            २.आम निवेशक को भी उन्ही वर्ग उत्पादों के क्रय-विक्रय की अनुमति दी जाए ,जिसके लिए उसने सरकार से अनुमति प्राप्त की है |
तीसरा चरण सरकार इस सिस्टम से किसानों को सीधे या सोसायटियों के माद्यम से या फिर किसान काल सेंटर के माद्यम से जोड़ सकती हैं |
सरकार चाहे क्रमबद्ध एक चरण या तीनों चरणों पर एक साथ कार्य कर सकती है |

परिणाम १.यह सिस्टम सभी तरहा के व्यपार करने वालो को एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराएगा | व्यपार में एक नयी स्पर्धा के लिए जगह बनाएगा |

         २. यह सरकार खासतोर पर राज्य सरकारों के राजस्व में बढोतरी करने वाला सिध्द होगा कयोकि ज्यों- ज्यों व्यपार में बढोतरी होगी अधिकतम व्यपार पक्के में होना शुरु हो जाएगा | राज्य सरकार चाहे तो कृषि उत्पादों पर परचेज टेक्स लगा सकती है | परन्तु उसके बाद उत्पाद बिना किसी अन्य प्रकार के टेक्स के पुरे देश में बिकने के लिए उपलब्ध रहना चाहिए | इस व्यवस्था का सीधा फायदा सरकार व किसानों को होगा |
         ३.सरकार इस व्यवस्था के जरिए तुरन्त पता लगा सकेगी की देश में किस उत्पाद की कमी होने वाली है, सरकार महंगाई को रोकने में सफल साबित हो सकेगी अगर नही हुई तो भी तुरन्त पता लग जाएगा की सिस्टम में कही गडबडी है |
          ४. रोजगार के अवसरों को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा |
          ५.अगर ईमानदारी से क्रमबद्ध विकास किया जाए तो यह  कोमोडिटी मार्केट अगले दश पन्द्रह सालो में शेयर मार्केट से भी बड़ा मार्केट बन सकता है |

नोट- यह लेख हिन्दुस्थान में ही व्यपार को ध्यान में रख-कर लिखा गया है | इससे जुड़े विदेशी व्यपार या अन्य विदेशी व्यपार समूहों की लेखक कोई जानकारी नही रखता | इस पर अलग से विमर्श किया जा सकता है | लेख के शुरू में जो टिप्पणी मेरे द्वारा की गयी है, उससे मेरा आशय किसी पर भी व्यक्तिगत या या सामुहिक आक्षेप लगाना नही है | अगर किसी को जरा भी ठेस लगी हो तो में हाथ जोड़-कर क्षमा मांगता हूँ |नेति-नेति 



Tuesday, 20 May 2014

जमीन अधिग्रहण के रगड़े –झगड़े से कैसे निकले बाहर | चिन्तन में सहभागीता | पढ़ें पुरा लेख |

मैने अपने पिछले लेख में चर्चाकी कि नयी सरकार को किस प्रकार भगती ,ज्ञान ,वैराग्य से आगे बढने चाहिए | सबसे जरूरी है, संवाद | इसी कड़ी में आज का संवाद – सुधिजनो से निवेदन है, मेरे इस प्रयास को किसी भी प्रकार से अन्यथा न ले | अगर किसी प्रकार की ध्रष्टता मुझसे हो गई हो तो अल्प-बुद्धि जान क्षमा करें |

आज के दौर में जमीन अधिग्रहण को लेकर नयी सरकार की क्या नीतियाँ रहेगी इसकी बड़ी चर्चा होती हैं ? हमारे पिछले अनुभव बड़े ही कटु रहें हैं |  अधिकतर समय रगड़े-झगड़े में निकल जाता है | रगडा –यानि इतने तरह के कानून है के किसी को भी उलझा कर रखा जा सकता है , नही झगड़ा तो खड़ा हो ही जाता है | क्यों ना सीधा व स्पष्ट संवाद हो | इसके लिए जरूरी है ,पारदर्शिता व ईमानदारी | क्या यह संभव है ,आओ विमर्श करें-

सर्वप्रथम विचार करते है ,आवश्यकता किसी चीज की है , तो वह है, जमीन | क्योकिं सभी कार्य जमीन पर ही  होने है | फिर यह विचार भी जरूरी है जमीन है किसके पास | यह विचार भी करना होगा उसको प्राप्त करने का तरीका कौन-सा हो | लगे हाथ यह भी विचार किया जाए प्राप्त करने वाला उसका क्या उपयोग करना चाहता है |

जमीन के दो ही मालिक है या तो सरकार या आम-आदमी | आम –आदमी किसान भी हो सकता है या अन्य कोई और भी | फिर जमीन कोई माले-मुफ्त तो है नही, जो कोई यू ही लुटा दे ; फिर अधिग्रहण किस बात का | मेरे विचार से यह अधिग्रहण शब्द ही झगड़ा खड़ा करता है |क्यों ना अधिग्रहण से अलग हटकर सोचा जाए ? क्योंना जमीन एक पारदर्शी तरीके से निविदा के आधार पर प्राप्त की जाए व निविदा के आधार पर ही दी जाए | आप लोग सोच रहें होंगे अजीब बेवकूफ है ऐसे कोन देगा जमीन | में कहना चाहुगा की हम ऐसा इस लिए सोच रहें है क्योंकि हमने रगड़े-झगड़े ही इतने बड़ा लिए है, कि हम सीधा और सरल समाधान करना ही नही चाहते | मेरे विचार में ऐसा आज कोई नही जो विकास नही चाहेगा, वह चाहे सरकार हो या आम-आदमी |

अब यह सवाल उठना सम्भाविक है ,इस तरहा से जमीन की लागत उद्योगिक समूह के लिए बढ़ जाएगी | कही भी जमीन के भाव तभी बड़ते है, जब उस क्षेत्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा हो जाता है | अगर सरकारे इस विषय में ईमानदारी से काम करें तो कोई परेशानी नही आएगी | इसका एक समाधन अनुदान के द्वारा भी किया जा सकता है | इस अनुदान का बोझ केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर उठा सकती है या दोनों में कोई एक | इसमें सरकारे यह भी सुनिश्चित कर सकती है की वह अपने यहाँ किस प्रकार के उद्योगिक समूहों को विकसित करेगी | 

अब आते है निविदा के नियम किस प्रकार के हो | यह भी सीधे व स्पस्ट हो | मान लीजिए कोई कम्पनी किसी जिले में कोई उद्योग लगाना चाहती है, वह सरकार के पास जाए के मुझे आपके जिले में इस प्रकार का उद्योग लगाना और उसके लिए मुझे सो एकड या उससे कम-ज्यादा जमीन की जरूरत है , क्या इसके लिए आप की मंजूरी है | या तो सरकार शुरूआत में ही इंकार कर देगी या सहमती देगी | उसके उपरांत जमीन प्राप्ति के लिए सावर्जनिक निविदा डाली जाए व सभी बातों का खुलासा शुरुआत में ही कर दिया जाए | इसमें चाहे तो सरकार मध्यस्थता करें या क्रेता जमीन मालिक से सीधे मूल्य निश्चित करके ले | अगर सरकार के पास कोई जमीन है तो सरकार उसे भी निविदा के आधार पर ही आबंटन करें ताकि स्पर्धा की भी गुंजाईश बनी रहें | साथ ही सरकार यह भी सुनिश्चित कर ले के जमीन जिस प्रयोग हेतु ली गयी है | क्या उसका प्रयोग उसी कार्य के लिए एक न्यूनतम तय समय सीमा में किया गया है ? अगर नही तो जमीन पुनः मालिक के पास चली जाए और धनराशि विक्रेता के पक्ष में  जब्त समझी जाए | लेंड बेंक बनाने की मंजूरी ना दी जाए |

 सरकार का मुख्य ध्यान उधमियो को प्रयाप्त सुरक्षा मुहैया कराना व उद्योग के आस-पास इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करके देने पर होना चाहिए | जिसके बारे में सरकार सहमती प्रमाण पत्र जारी करें | जिसमे सरकार अगर किसी प्रकार का अनुदान देना चाहती है तो विस्तार से उसका भी वर्णन किया जाए | यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहेगी | इसमें दोनों तरफ के ईमानदार लोग या कहे ईमानदार सरकारे फायदे में रहेंगें | अगर नियत व नीति सही हो तो सभी कुछ संभव है | ना ज्यादा रगडा ना ज्यादा झगड़ा अगर कोई विषय छुट गया हो तो उस पर भी संवाद किया जा सकता है | यह विषय सरकारी या गैर-सरकारी उद्योग समूहों के लिए था | सड़क निर्माण या रेलवे के लिए पटरी बिछाने का काम तो अधिग्रहण के जरिए ही संभव है |  नेति-नेति  

Sunday, 18 May 2014

नयी सरकार से बंधी आशाओं व आकांक्षाओं के बीच ‘नव प्रक्रियावाद ‘-

आज पुरे देश की आशाएँ व आकंक्षाऐ नयी सरकार व नये प्रधनमन्त्री से जुडी हुई है | नये जनादेश में सम्पूर्ण भारत के दर्शन होते है | इसका एक अर्थ यह भी निकलता है,प्रधानमंत्री किसी एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व नही करते | वह सभी जाति ,समुदायों,अगडो-पिछडो और समाजिक असमानता में जी रही आम-जनता का प्रतिनिधित्व करते है | नयी सरकार को बड़ा बहुमत मिला हैं ,उतना ही बड़ा आकार जनता की उम्मीदों का भी हैं | सभी को विकास चाहिए और निश्चित तौर पर यह सरकार की जिम्मेदारी हैं |
नयी सरकार के लिए सबके बीच संतुलित तालमेल रख कर सबका विकास करना परमावश्यक है | यह कैसे संभव होगा ,यह प्रश्न सबके सम्मुख खड़ा हैं ? साथ ही प्रश्न यह भी हैं ,क्या राष्ट्र के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बोध की जिम्मेदारी केवल प्रधानमंत्री पर ही है ? आईए विमर्श साँझा करे |

प्रधानमंत्री जी ने देश की सवासौ करोड जनता की बात की हैं | जिसे हम रोड –मेप कहते है, वह तो बिलकुल तैयार है | प्रथम आवश्यकता है संवाद –वह भी सीधा | फिर प्रश्न उठा किससे और कैसे ,और उसका विषय क्या रहें ? ऊतर स्पष्ट है,सभी से और उसका आकार व विषय भी जनादेश में स्पष्ट है | संवाद स्पष्ट है,’’जो आज जहाँ हैं वह वहाँ रहकर अपना कार्य पूरी निष्ठापूर्वक करे ‘’ |यह सुत्र बड़ा काम कर सकता हैं | इसमें किसी को समस्या नही होनी चाहिए परन्तु यह समाधन बहुत-सी समस्याओं का कर सकता हैं | इसमें सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनकी होगी जो आज शीर्ष पर बैठे हैं | सरकार का काम हो उन अवसरों को सुनिश्चित करना जो सभीको और सबके लिए उपलब्ध हो | सरकार ईमानदारी से काम करने वालो व ईमानदार लोगों को आगे लाने में प्रतिबद्ध रहें | इसका यह अर्थ कतई नही हो की सरकार किसी की ईमानदारी पर शक करे |


हमे रटी-रटाई परिपाटियों से बहार निकलना होगा | न ही कोरा समाजवाद न ही कोरा पूंजीवाद इसके बीच का रास्ता चाहिए | जिसे नाम दे सकते हैं ‘नव-प्रक्रियावाद ‘ | समाजवाद को पूंजीवाद के दबाब से व पूंजीवाद को समाजवाद के दबाब से मुक्त करना होगा | सरकार केवल सरकार बनकर कार्य करे तो इस कठिन लक्ष्य को भी पाया जा सकता हैं | सरकार की द्रष्टि भक्ति,ज्ञान और वैराग्य की रहनी चाहिए | वरना चाहे हम कितना भी दिखावा करे चाहे हम किसी भी भाषा का प्रयोग कर अपने को गुमराह करें, जब तक सादगी व सबकी भलाई का लक्ष्य निहित नही होगा तब तक हमारी सफलता संदिग्ध ही रहेगी | नेति नेति 

Friday, 2 May 2014

भामती -जो बन गयी वेदांत दर्शन की सुप्रसिद्ध भामती टिका |

त्याग,तपस्या व सेवा भाव की प्रतिमूर्ति -भामती -जो बन गयी वेदांत दर्शन की सुप्रसिद्ध भामती टिका |


प्रसिद्ध विद्वान वाचस्पति मिश्र का विवाह कम आयु में ही हो गया था। जब वह विद्या अर्जित करके घर लौटे तो उन्होंने अपनी मां से वेदांत दर्शन पर ग्रंथ लिखने की आज्ञा मांगी। उन्होंने कहा कि जब तक उनका ग्रंथ पूरा न हो, तब तक उनका ध्यान भंग न किया जाए। उनकी माता चूंकि काफी बूढ़ी हो चुकी थीं, सो उन्होंने अपने पुत्र की साहित्य साधना में सहयोग करने के लिए अपनी पुत्रवधू भामती को बुला लिया। भामती ने वाचस्पति की सेवा का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। कुछ समय बाद माता जी का देहावसान हो गया। भामती तन-मन से पति की सेवा में लगी रही। वाचस्पति मिश्र साहित्य साधना में ऐसे लीन रहे कि उन्हें इस बात का बोध ही नहीं हो पाया कि उनकी सेवा कौन कर रहा है। इस तरह तीस वर्ष की अवधि बीत गई।
एक शाम दीपक का तेल खत्म हो गया लेकिन तभी वाचस्पति मिश्र का ग्रंथ भी पूरा हो गया। दीपक के बुझने से भामती को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा कि वाचस्पति को लिखने में नाहक बाधा पडी़। वह अन्य काम छोड़कर दीपक में जल्दी-जल्दी तेल डालने लगी। अपने लेखन से अभी-अभी मुक्त हुए वाचस्पति ने जब अपनी पुस्तक से सिर उठाया तो सामने एक अपरिचित नारी को देखकर चौंक गए। उन्होंने सोचा कि यह तो उनकी मां नहीं है, फिर उनके अध्ययन कक्ष में कौन चला आया है। उन्होंने आदर पूर्वक पूछा, ‘हे देवी, आप कौन हैं?’ भामती ने कहा, ‘हे देव! मैं आपकी पत्नी हूं।सुनकर वाचस्पति मिश्र जैसे सघन निद्रा से जागे और पूछ बैठे,’ देवी, तुम्हारा नाम क्या है?’ उसने उसी तरह सकुचाते हुए कहा, ‘मेरा नाम भामती है।वाचस्पति मिश्र उसके त्याग और सेवा भाव से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्काल कलम उठाई और अपने ग्रंथ पर लिखा-भामती। इस तरह उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम अपनी पत्नी के नाम पर रखा और भामती को उसकी सेवा का पुरस्कार देने की कोशिश की।

टिप्पणी -आज के इस घोर कलयुगी वतावरण में आप इनकी तुलना किससे कर सकते है ? कृपया अपनी राय अवश्य दे |

“ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ”

पश्चिमीदेशीय लोगों ! तुम्हारी जो इच्छा हों कह डालो – अभी यह तुम लोगों का समय है | आओ बच्चो ! जो कुछ बकना हों, बक डालो | हमने यथेष्ट अभिज्ञता प्राप्त कर ली है और इसलिए हम चुप है | आज तुम लोगों के पास धन है, और इसलिए तुम लोग हमारी ओर तिरिस्कार की दृष्टि से देखते हों | अच्छा, यह तुम्हारा समय है, बच्चो ! जितना बकना हों, बक लो – यही हिन्दुओ का मनोभाव है |


~ स्वामी विवेकानंद  


पश्चिमदेशीय जड़वादी भोग-विलास प्रधान संस्कृति के दुष्परिणाम

दिग्विजय की दुल्हनियां बनेगी टीवी एंकर अम्रता राय , टि्वटर पर किया ऐलान - आज तक


क्या यही कारण तो नही पश्चिमदेशीय संस्कृति को पालने का ? इस जड़वादी भोग-विलास प्रधान संस्कृति के दुष्परिणाम निरंतर हमारे सामने आ रहें है ,जिसे कई तरह के कुतर्क देकर हम पर लादा जाता हैं |


ऐसे परिणाम तो रोज ही खबर बनते जाएगे | इन भटके रहनुमाओं को कौन रास्ता दिखाएगा जो दशानन बन गये हैं | उस पर भी अपने -आप को, समाज में उच्च स्थान पर विराजमान देखना | ऊपर से यह कहना देखो मैने स्वीकार कर लिया है, हूँ न हिम्मत वाला |

बात क्या इतनी सी है? ; प्रथम तो आप सावर्जनिक जीवन में है, यहाँ आपका व्यक्तित्व अनेको से जुड़ा है | दूसरा आप उस पार्टी से सम्बन्धित रहें है जिसने इस देश पर लम्बे समय तक शासन किया है और आप शासन के दौरान महत्वपूर्ण पदों पर भी रहें है | क्या आपने जो किया है वह प्रणय की परिभाषा में आ सकता है ? फिर पाप किसे कहेगे ? सुनने में आया है, लड़की अपने बचपन में आप की गोद में खेल कर बड़ी हुई है |