मैने अपने पिछले लेख में चर्चाकी कि नयी सरकार को किस प्रकार भगती ,ज्ञान
,वैराग्य से आगे बढने चाहिए | सबसे जरूरी है, संवाद | इसी कड़ी में आज का संवाद –
सुधिजनो से निवेदन है, मेरे इस प्रयास को किसी भी प्रकार से अन्यथा न ले | अगर
किसी प्रकार की ध्रष्टता मुझसे हो गई हो तो अल्प-बुद्धि जान क्षमा करें |
आज के दौर में जमीन अधिग्रहण को लेकर नयी सरकार की क्या नीतियाँ रहेगी
इसकी बड़ी चर्चा होती हैं ? हमारे पिछले अनुभव बड़े ही कटु रहें हैं | अधिकतर समय रगड़े-झगड़े में निकल जाता है |
रगडा –यानि इतने तरह के कानून है के किसी को भी उलझा कर रखा जा सकता है , नही झगड़ा
तो खड़ा हो ही जाता है | क्यों ना सीधा व स्पष्ट संवाद हो | इसके लिए जरूरी है
,पारदर्शिता व ईमानदारी | क्या यह संभव है ,आओ विमर्श करें-
सर्वप्रथम विचार करते है ,आवश्यकता किसी चीज की है , तो वह है, जमीन |
क्योकिं सभी कार्य जमीन पर ही होने है |
फिर यह विचार भी जरूरी है जमीन है किसके पास | यह विचार भी करना होगा उसको प्राप्त
करने का तरीका कौन-सा हो | लगे हाथ यह भी विचार किया जाए प्राप्त करने वाला उसका
क्या उपयोग करना चाहता है |
जमीन के दो ही मालिक है या तो सरकार या आम-आदमी | आम –आदमी किसान भी
हो सकता है या अन्य कोई और भी | फिर जमीन कोई माले-मुफ्त तो है नही, जो कोई यू ही
लुटा दे ; फिर अधिग्रहण किस बात का | मेरे विचार से यह अधिग्रहण शब्द ही झगड़ा खड़ा
करता है |क्यों ना अधिग्रहण से अलग हटकर सोचा जाए ? क्योंना जमीन एक पारदर्शी
तरीके से निविदा के आधार पर प्राप्त की जाए व निविदा के आधार पर ही दी जाए | आप
लोग सोच रहें होंगे अजीब बेवकूफ है ऐसे कोन देगा जमीन | में कहना चाहुगा की हम ऐसा
इस लिए सोच रहें है क्योंकि हमने रगड़े-झगड़े ही इतने बड़ा लिए है, कि हम सीधा और सरल
समाधान करना ही नही चाहते | मेरे विचार में ऐसा आज कोई नही जो विकास नही चाहेगा,
वह चाहे सरकार हो या आम-आदमी |
अब यह सवाल उठना सम्भाविक है ,इस तरहा से जमीन की लागत उद्योगिक समूह
के लिए बढ़ जाएगी | कही भी जमीन के भाव तभी बड़ते है, जब उस क्षेत्र में
इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा हो जाता है | अगर सरकारे इस विषय में ईमानदारी से काम करें
तो कोई परेशानी नही आएगी | इसका एक समाधन अनुदान के द्वारा भी किया जा सकता है |
इस अनुदान का बोझ केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर उठा सकती है या दोनों में कोई एक |
इसमें सरकारे यह भी सुनिश्चित कर सकती है की वह अपने यहाँ किस प्रकार के उद्योगिक
समूहों को विकसित करेगी |
अब आते है निविदा के नियम किस प्रकार के हो | यह भी सीधे व स्पस्ट हो
| मान लीजिए कोई कम्पनी किसी जिले में कोई उद्योग लगाना चाहती है, वह सरकार के पास
जाए के मुझे आपके जिले में इस प्रकार का उद्योग लगाना और उसके लिए मुझे सो एकड या
उससे कम-ज्यादा जमीन की जरूरत है , क्या इसके लिए आप की मंजूरी है | या तो सरकार
शुरूआत में ही इंकार कर देगी या सहमती देगी | उसके उपरांत जमीन प्राप्ति के लिए
सावर्जनिक निविदा डाली जाए व सभी बातों का खुलासा शुरुआत में ही कर दिया जाए |
इसमें चाहे तो सरकार मध्यस्थता करें या क्रेता जमीन मालिक से सीधे मूल्य निश्चित
करके ले | अगर सरकार के पास कोई जमीन है तो सरकार उसे भी निविदा के आधार पर ही
आबंटन करें ताकि स्पर्धा की भी गुंजाईश बनी रहें | साथ ही सरकार यह भी सुनिश्चित
कर ले के जमीन जिस प्रयोग हेतु ली गयी है | क्या उसका प्रयोग उसी कार्य के लिए एक न्यूनतम तय
समय सीमा में किया गया है ? अगर नही तो जमीन पुनः मालिक के पास चली जाए और धनराशि
विक्रेता के पक्ष में जब्त समझी जाए | लेंड
बेंक बनाने की मंजूरी ना दी जाए |
सरकार का मुख्य ध्यान उधमियो को प्रयाप्त
सुरक्षा मुहैया कराना व उद्योग के आस-पास इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करके देने पर
होना चाहिए | जिसके बारे में सरकार सहमती प्रमाण पत्र जारी करें | जिसमे सरकार अगर
किसी प्रकार का अनुदान देना चाहती है तो विस्तार से उसका भी वर्णन किया जाए | यह
पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहेगी | इसमें दोनों तरफ के ईमानदार लोग या कहे ईमानदार
सरकारे फायदे में रहेंगें | अगर नियत व नीति सही हो तो सभी कुछ संभव है | ना
ज्यादा रगडा ना ज्यादा झगड़ा अगर कोई विषय छुट गया हो तो उस पर भी संवाद किया जा
सकता है | यह विषय सरकारी या गैर-सरकारी उद्योग समूहों के लिए था | सड़क निर्माण या
रेलवे के लिए पटरी बिछाने का काम तो अधिग्रहण के जरिए ही संभव है | नेति-नेति
आज के दौर में जमीन अधिग्रहण को लेकर नयी सरकार की क्या नीतियाँ रहेगी इसकी बड़ी चर्चा होती हैं ? हमारे पिछले अनुभव बड़े ही कटु रहें हैं | अधिकतर समय रगड़े-झगड़े में निकल जाता है | रगडा –यानि इतने तरह के कानून है के किसी को भी उलझा कर रखा जा सकता है , नही झगड़ा तो खड़ा हो ही जाता है | क्यों ना सीधा व स्पष्ट संवाद हो | इसके लिए जरूरी है ,पारदर्शिता व ईमानदारी | क्या यह संभव है ,आओ विमर्श करें-
सर्वप्रथम विचार करते है ,आवश्यकता किसी चीज की है , तो वह है, जमीन | क्योकिं सभी कार्य जमीन पर ही होने है | फिर यह विचार भी जरूरी है जमीन है किसके पास | यह विचार भी करना होगा उसको प्राप्त करने का तरीका कौन-सा हो | लगे हाथ यह भी विचार किया जाए प्राप्त करने वाला उसका क्या उपयोग करना चाहता है |
जमीन के दो ही मालिक है या तो सरकार या आम-आदमी | आम –आदमी किसान भी हो सकता है या अन्य कोई और भी | फिर जमीन कोई माले-मुफ्त तो है नही, जो कोई यू ही लुटा दे ; फिर अधिग्रहण किस बात का | मेरे विचार से यह अधिग्रहण शब्द ही झगड़ा खड़ा करता है |क्यों ना अधिग्रहण से अलग हटकर सोचा जाए ? क्योंना जमीन एक पारदर्शी तरीके से निविदा के आधार पर प्राप्त की जाए व निविदा के आधार पर ही दी जाए | आप लोग सोच रहें होंगे अजीब बेवकूफ है ऐसे कोन देगा जमीन | में कहना चाहुगा की हम ऐसा इस लिए सोच रहें है क्योंकि हमने रगड़े-झगड़े ही इतने बड़ा लिए है, कि हम सीधा और सरल समाधान करना ही नही चाहते | मेरे विचार में ऐसा आज कोई नही जो विकास नही चाहेगा, वह चाहे सरकार हो या आम-आदमी |
अब यह सवाल उठना सम्भाविक है ,इस तरहा से जमीन की लागत उद्योगिक समूह के लिए बढ़ जाएगी | कही भी जमीन के भाव तभी बड़ते है, जब उस क्षेत्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा हो जाता है | अगर सरकारे इस विषय में ईमानदारी से काम करें तो कोई परेशानी नही आएगी | इसका एक समाधन अनुदान के द्वारा भी किया जा सकता है | इस अनुदान का बोझ केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर उठा सकती है या दोनों में कोई एक | इसमें सरकारे यह भी सुनिश्चित कर सकती है की वह अपने यहाँ किस प्रकार के उद्योगिक समूहों को विकसित करेगी |
अब आते है निविदा के नियम किस प्रकार के हो | यह भी सीधे व स्पस्ट हो | मान लीजिए कोई कम्पनी किसी जिले में कोई उद्योग लगाना चाहती है, वह सरकार के पास जाए के मुझे आपके जिले में इस प्रकार का उद्योग लगाना और उसके लिए मुझे सो एकड या उससे कम-ज्यादा जमीन की जरूरत है , क्या इसके लिए आप की मंजूरी है | या तो सरकार शुरूआत में ही इंकार कर देगी या सहमती देगी | उसके उपरांत जमीन प्राप्ति के लिए सावर्जनिक निविदा डाली जाए व सभी बातों का खुलासा शुरुआत में ही कर दिया जाए | इसमें चाहे तो सरकार मध्यस्थता करें या क्रेता जमीन मालिक से सीधे मूल्य निश्चित करके ले | अगर सरकार के पास कोई जमीन है तो सरकार उसे भी निविदा के आधार पर ही आबंटन करें ताकि स्पर्धा की भी गुंजाईश बनी रहें | साथ ही सरकार यह भी सुनिश्चित कर ले के जमीन जिस प्रयोग हेतु ली गयी है | क्या उसका प्रयोग उसी कार्य के लिए एक न्यूनतम तय समय सीमा में किया गया है ? अगर नही तो जमीन पुनः मालिक के पास चली जाए और धनराशि विक्रेता के पक्ष में जब्त समझी जाए | लेंड बेंक बनाने की मंजूरी ना दी जाए |
सरकार का मुख्य ध्यान उधमियो को प्रयाप्त सुरक्षा मुहैया कराना व उद्योग के आस-पास इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करके देने पर होना चाहिए | जिसके बारे में सरकार सहमती प्रमाण पत्र जारी करें | जिसमे सरकार अगर किसी प्रकार का अनुदान देना चाहती है तो विस्तार से उसका भी वर्णन किया जाए | यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहेगी | इसमें दोनों तरफ के ईमानदार लोग या कहे ईमानदार सरकारे फायदे में रहेंगें | अगर नियत व नीति सही हो तो सभी कुछ संभव है | ना ज्यादा रगडा ना ज्यादा झगड़ा अगर कोई विषय छुट गया हो तो उस पर भी संवाद किया जा सकता है | यह विषय सरकारी या गैर-सरकारी उद्योग समूहों के लिए था | सड़क निर्माण या रेलवे के लिए पटरी बिछाने का काम तो अधिग्रहण के जरिए ही संभव है | नेति-नेति
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