Friday, 2 May 2014

भामती -जो बन गयी वेदांत दर्शन की सुप्रसिद्ध भामती टिका |

त्याग,तपस्या व सेवा भाव की प्रतिमूर्ति -भामती -जो बन गयी वेदांत दर्शन की सुप्रसिद्ध भामती टिका |


प्रसिद्ध विद्वान वाचस्पति मिश्र का विवाह कम आयु में ही हो गया था। जब वह विद्या अर्जित करके घर लौटे तो उन्होंने अपनी मां से वेदांत दर्शन पर ग्रंथ लिखने की आज्ञा मांगी। उन्होंने कहा कि जब तक उनका ग्रंथ पूरा न हो, तब तक उनका ध्यान भंग न किया जाए। उनकी माता चूंकि काफी बूढ़ी हो चुकी थीं, सो उन्होंने अपने पुत्र की साहित्य साधना में सहयोग करने के लिए अपनी पुत्रवधू भामती को बुला लिया। भामती ने वाचस्पति की सेवा का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। कुछ समय बाद माता जी का देहावसान हो गया। भामती तन-मन से पति की सेवा में लगी रही। वाचस्पति मिश्र साहित्य साधना में ऐसे लीन रहे कि उन्हें इस बात का बोध ही नहीं हो पाया कि उनकी सेवा कौन कर रहा है। इस तरह तीस वर्ष की अवधि बीत गई।
एक शाम दीपक का तेल खत्म हो गया लेकिन तभी वाचस्पति मिश्र का ग्रंथ भी पूरा हो गया। दीपक के बुझने से भामती को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा कि वाचस्पति को लिखने में नाहक बाधा पडी़। वह अन्य काम छोड़कर दीपक में जल्दी-जल्दी तेल डालने लगी। अपने लेखन से अभी-अभी मुक्त हुए वाचस्पति ने जब अपनी पुस्तक से सिर उठाया तो सामने एक अपरिचित नारी को देखकर चौंक गए। उन्होंने सोचा कि यह तो उनकी मां नहीं है, फिर उनके अध्ययन कक्ष में कौन चला आया है। उन्होंने आदर पूर्वक पूछा, ‘हे देवी, आप कौन हैं?’ भामती ने कहा, ‘हे देव! मैं आपकी पत्नी हूं।सुनकर वाचस्पति मिश्र जैसे सघन निद्रा से जागे और पूछ बैठे,’ देवी, तुम्हारा नाम क्या है?’ उसने उसी तरह सकुचाते हुए कहा, ‘मेरा नाम भामती है।वाचस्पति मिश्र उसके त्याग और सेवा भाव से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्काल कलम उठाई और अपने ग्रंथ पर लिखा-भामती। इस तरह उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम अपनी पत्नी के नाम पर रखा और भामती को उसकी सेवा का पुरस्कार देने की कोशिश की।

टिप्पणी -आज के इस घोर कलयुगी वतावरण में आप इनकी तुलना किससे कर सकते है ? कृपया अपनी राय अवश्य दे |

“ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ”

पश्चिमीदेशीय लोगों ! तुम्हारी जो इच्छा हों कह डालो – अभी यह तुम लोगों का समय है | आओ बच्चो ! जो कुछ बकना हों, बक डालो | हमने यथेष्ट अभिज्ञता प्राप्त कर ली है और इसलिए हम चुप है | आज तुम लोगों के पास धन है, और इसलिए तुम लोग हमारी ओर तिरिस्कार की दृष्टि से देखते हों | अच्छा, यह तुम्हारा समय है, बच्चो ! जितना बकना हों, बक लो – यही हिन्दुओ का मनोभाव है |


~ स्वामी विवेकानंद  


पश्चिमदेशीय जड़वादी भोग-विलास प्रधान संस्कृति के दुष्परिणाम

दिग्विजय की दुल्हनियां बनेगी टीवी एंकर अम्रता राय , टि्वटर पर किया ऐलान - आज तक


क्या यही कारण तो नही पश्चिमदेशीय संस्कृति को पालने का ? इस जड़वादी भोग-विलास प्रधान संस्कृति के दुष्परिणाम निरंतर हमारे सामने आ रहें है ,जिसे कई तरह के कुतर्क देकर हम पर लादा जाता हैं |


ऐसे परिणाम तो रोज ही खबर बनते जाएगे | इन भटके रहनुमाओं को कौन रास्ता दिखाएगा जो दशानन बन गये हैं | उस पर भी अपने -आप को, समाज में उच्च स्थान पर विराजमान देखना | ऊपर से यह कहना देखो मैने स्वीकार कर लिया है, हूँ न हिम्मत वाला |

बात क्या इतनी सी है? ; प्रथम तो आप सावर्जनिक जीवन में है, यहाँ आपका व्यक्तित्व अनेको से जुड़ा है | दूसरा आप उस पार्टी से सम्बन्धित रहें है जिसने इस देश पर लम्बे समय तक शासन किया है और आप शासन के दौरान महत्वपूर्ण पदों पर भी रहें है | क्या आपने जो किया है वह प्रणय की परिभाषा में आ सकता है ? फिर पाप किसे कहेगे ? सुनने में आया है, लड़की अपने बचपन में आप की गोद में खेल कर बड़ी हुई है |


Saturday, 26 April 2014

एक परिवार का राजनीतिक बंधक भारत

भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को जिस प्रकार एक परिवार ने अपना बंधक बना रखा है ,ऐसी मिशाल दुनिया में अन्यत्र ही कही मिले | इस परिवार ने अंग्रेजो की “फुट डालो राज़ करो “ की नीति को ही नहीं अपनाया वरन वह सभी हथकंडे  अपनाये जो अंग्रेजो ने हिन्दुस्थान पर अपना राज़ कायम करने के लिये अपनाये थे | उनके इस कृत्य को आगे बढ़ाने के लिये वही लोग सहभागी होते है, जो उनसे बढ़ा लाभ पाते है |

इस परिवार की आखिरी पीढ़ी भी न तो भारतीय संस्कृति से कोई लगाव रखती है और न ही भारत के गौरवशाली इतिहास से | ये लोग भारतीय प्रतीकों पर निरंतर प्रहार करते है और भारत के महापुरुषों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा  करते है | ये लोग माता सीता पर तो सवाल खड़े करते है परन्तु अपनी माँ से कभी यह नहीं पूछते के विवाह के उपरांत भी एक लंबे समय तक उन्होंने भारत की नागरिकता क्यों नहीं ग्रहण की? आज उस परिवार के अंतिम वारीस राहुल ने श्री गुरूजी पर सवाल उठाये, मै उसका जवाब देना भी उचित नहीं समझता क्योंकि वह उस महापुरुष के चरणों की धुल के समान भी नहीं है |



इन लोगों को झूठ बोलना घुटी में पिलाया गया है और इनका जन्म ही कुसंस्कारों के मध्य हुआ है | इसका एक उदाहरण ये है कि, ये लोग अपनी विपक्षी पार्टी के लिये कहते है के इनके यहाँ बुजुर्गो का सम्मान नहीं होता, जिसे यह कभी सिद्ध नहीं करते | इसके उत्तर में कहना चाहूंगा के अपमान तो आपने स्वयं श्री मनमोहन सिंह जी व उनकी कैबिनेट का किया जो पुरे देश ने देखा था | मनमोहन सिंह जी बुजुर्ग ही नहीं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री भी है | राहुल ने भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसन मनमोहन सिंह जी का पुरे देश के समक्ष अपमान किया | वह भी उस समय जब वह विदेशी दौरे पर थे | ये लोग उस त्याग का भी सम्मान नहीं करते जो अपने वंश को बढ़ाने से ज्यादा देश के लिये अपना जीवन समर्पित करता है | ये लोग उसकी भी भर्तस्ना यह कह कर करते है, जो अपनी नारी का सम्मान नहीं कर सका वह ओरों का क्या सम्मान करेगा | इसी प्रकार अनेक तरह के प्रपंचो का जाल ये लोग फैलाते रहते है |

इन लोग ने इस देश को राजनीतिक रूप से बंधक रख कर जो-जो कुकर्म किये, उसका जवाब इनके पास कुछ नहीं | इसलिए वोट पाने के लिये निरंतर गुमराह करने वाले बयान दिए जाते है या फिर भावनात्मक अपील जारी कर जनता को बरगलाया  जाता है |

Wednesday, 2 April 2014

श्री अरविन्द के विचार आज भी उतने ही महत्व रखते है,जितने आजादी के समय ।

आज भी शासन व्यवस्था ब्रिटिश शासन के द्वारा पंहुचाये गये लाभउसकी न्याय प्रणाली में विश्वास व ब्रिटिश शिक्षा उपयुक्तता का गुणगान करते है यह आज भी कांग्रेस- दल के विचारों का स्त्रोत बना है ब्रिटिश शासन व्यवस्था की मूल भावना हिन्दुस्थान पर अपना राज़ कायम रखना था इसलिए उसने हर वह कार्य किया जो आम हिंदुस्तानी को उसके गौरवशाली इतिहास से वंचित रखता

श्री अरविन्द ने स्वतन्त्रता का लक्ष्य ब्रिटिशों के प्रति घृणा अथवा उनके कुशासन,अत्याचार के आरोपों के आधार पर नही ,बल्कि भारतीय राष्ट्र के स्वतःसिद्ध अधिकार के बल पर किया था उनहोंन “अंग्रेजी और नौकरशाही शासन” कि तुलना और विरोध मे ‘भारतीय और राष्ट्रीय शासन’ की पदावली का प्रयोग कियाजो आज भी प्रासंगिक है ( इस अर्थ मे की नौकरशाही आधारित शासन राष्ट्रीय नहीविजातीय है ) श्री अरविन्द ने लिखा, “ कोई पराधीन राष्ट्र क्रमशः प्रगति करते –करते स्वतन्त्रता तक नही पहुँचताबल्कि स्वतन्त्रता प्राप्त करके अपनी प्रगति का मार्ग खोलता है विदेशी शासन के कारण भारत में जो नपुंसकताप्रगति में अवरोधशिथिलतादरिद्रताआर्थिक दासता आदि के जो बुरे परिणाम हुए थेउसकी आलोचना "वन्दे मातरम और धर्म" के पन्ने पर ऐसे तीव्र शब्दों और दृढ़ता के साथ की गयी जो पहले कभी नहीं की गयी थी इसने बल दिया की विदेशी शासन कितना भी उदार क्यों न होंवह स्वतंत्रस्वस्थ राष्ट्र जीवन का स्थान कभी नहीं ले सकता 

इन लेखो के कारण राष्ट्रवादियों के विचारों की सर्वत्र विजय हुई  एक राष्ट्र के विचारों को पलटने और उसे बृहत परिवर्तन के लिये तैयार करने में "वन्दे मातरम" ने जो प्रभाव डालावह पत्रकारिता के इतिहास में अद्वितीय ही था 

Sunday, 23 March 2014

कब और कैसे मिलेगी जातिवादी दंश से मुक्ति ,इसकी कौन उठाएगा जिम्मेदारी -

कब और कैसे मिलेगी जातिवादी दंश से मुक्ति ,इसकी कौन उठाएगा जिम्मेदारी -

हमने अपनी आँखों पर बहुत सी पट्टीया बाँध ली हैं और कानों में रुइया ठूस रखी हैं |उदाहरण के तौर पर हम कह रहें हैं यह प्रत्याशी बाहर का हैं यह घर का |प्रत्याशी का व्यक्तित्व कैसा हैं , वह हमारा नेता बनने के काबिल हैं या नही इस पर विचार नही होता | आखिर पार्टी भी तो कुछ सोच कर ही प्रत्याशी को मैदान में उतारती हैं | जब एक –एक सीट का सवाल हों तब क्या पार्टी हारने के लिए चुनाव लडेगी ?आखिर हम क्यों जाति के आधार पर अपने क्षेत्र के प्रत्याशी की अभिलाषा करते हैं,ऐसी स्थिति में प्रत्याशियों का चुनाव करने में राजनीतिक दलों के समक्ष बड़ी चुनोती खड़ी हों जाती हैं |अच्छे नेता जो समाज को सही दिशा दे सकते हैं वे आगे नही आ पाते |यह ब्राह्मण भाई ,यह राजपूत भाई ,यह जाट भाई ,या अन्य कोई मेरी ही जाति-बिरादरी का भाई |मेरा तो यहाँ तक मानना हैं,इसी जातिवादी मानसिकता में माफियावाद व अन्य समाजिक वैमनस्यता अपना विस्तार पाती हैं | वहाँ भी हम जाने अनजाने में इस अव्यवस्था का समर्थन करते दिखाई पड़ते हैं |
क्या आपने किसी नेता को यह कहते सुना हैं मुझे केवल मेरी ही जात का वोट चाहिए और किसी का नही ? इस जातिवाद की राजनीति में कुछ गिने-चुने लोग ही फायदा उठाते हैं,आम आदमी का या आम पार्टी कार्यकर्ता का इसमें कोई फायदा नही होता ;वह तो केवल सुर में सुर मिलाने के काम आता हैं |इसमें सबसे ज्यादा नुकसान पार्टी व उसमे काम कर रहें आम कार्यकर्ता का होता हैं |इसमें भी सबसे ज्यादा नुकसान हमारे हिन्दुत्ववादी द्रष्टिकोण का हुआ हैं और हमे बाटने का काम हुआ हैं |इसलिए मित्रों इस कोंग्रेसी संस्कृति से बाहर निकलिए और देश के बारे में चिंतन करिए | मित्रों ध्यान रखे ‘यथा राजा तथा प्रजा या तथा प्रजा यथा राजा ‘ |अगर बदलाव लाना हैं तो, सर्वप्रथम राष्ट्र –हित बाकि के हित बाद में |
जात न पूछो साधु की ,पूछ लिज्यो ज्ञान |

मोल करो तलवार का ,पड़ा रहन दो म्यान ||

Thursday, 20 March 2014

भारतीय जनता पार्टी का हर एक कार्यकर्ता पार्टी का अनुशासित सिपाही हैं |

भारतीय जनता पार्टी का हर एक कार्यकर्ता पार्टी का अनुशासित सिपाही हैं | भारतीय जनता पार्टी उर्जावान व संस्कारित कार्यकर्ताओं की उर्वरक भूमि हैं जो देश के लिए किसी भी प्रकार के त्याग के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं इसमें कोंग्रेसी संस्कृति का लेशमात्र भी अंश नही हैं फिर टिकट वितरण तो मामूली सी बात हैं, किसी भी प्रकार की अंतर्कलह या मनभेद का तो सवाल ही नही उठता इसकी लड़ाई कोंग्रेस के कुशासन के खिलाफ हैं | यह देश में एक स्थिर सरकार के लिए काम करेगी | जल्द ही पार्टी का कार्यकर्ता यह सिद्ध करके दिखा देगा |
                             एक हैं अपनी जंमी 
                             एक हैं अपना वतन 

                            आवाज दो हम एक हैं