Wednesday, 2 April 2014

श्री अरविन्द के विचार आज भी उतने ही महत्व रखते है,जितने आजादी के समय ।

आज भी शासन व्यवस्था ब्रिटिश शासन के द्वारा पंहुचाये गये लाभउसकी न्याय प्रणाली में विश्वास व ब्रिटिश शिक्षा उपयुक्तता का गुणगान करते है यह आज भी कांग्रेस- दल के विचारों का स्त्रोत बना है ब्रिटिश शासन व्यवस्था की मूल भावना हिन्दुस्थान पर अपना राज़ कायम रखना था इसलिए उसने हर वह कार्य किया जो आम हिंदुस्तानी को उसके गौरवशाली इतिहास से वंचित रखता

श्री अरविन्द ने स्वतन्त्रता का लक्ष्य ब्रिटिशों के प्रति घृणा अथवा उनके कुशासन,अत्याचार के आरोपों के आधार पर नही ,बल्कि भारतीय राष्ट्र के स्वतःसिद्ध अधिकार के बल पर किया था उनहोंन “अंग्रेजी और नौकरशाही शासन” कि तुलना और विरोध मे ‘भारतीय और राष्ट्रीय शासन’ की पदावली का प्रयोग कियाजो आज भी प्रासंगिक है ( इस अर्थ मे की नौकरशाही आधारित शासन राष्ट्रीय नहीविजातीय है ) श्री अरविन्द ने लिखा, “ कोई पराधीन राष्ट्र क्रमशः प्रगति करते –करते स्वतन्त्रता तक नही पहुँचताबल्कि स्वतन्त्रता प्राप्त करके अपनी प्रगति का मार्ग खोलता है विदेशी शासन के कारण भारत में जो नपुंसकताप्रगति में अवरोधशिथिलतादरिद्रताआर्थिक दासता आदि के जो बुरे परिणाम हुए थेउसकी आलोचना "वन्दे मातरम और धर्म" के पन्ने पर ऐसे तीव्र शब्दों और दृढ़ता के साथ की गयी जो पहले कभी नहीं की गयी थी इसने बल दिया की विदेशी शासन कितना भी उदार क्यों न होंवह स्वतंत्रस्वस्थ राष्ट्र जीवन का स्थान कभी नहीं ले सकता 

इन लेखो के कारण राष्ट्रवादियों के विचारों की सर्वत्र विजय हुई  एक राष्ट्र के विचारों को पलटने और उसे बृहत परिवर्तन के लिये तैयार करने में "वन्दे मातरम" ने जो प्रभाव डालावह पत्रकारिता के इतिहास में अद्वितीय ही था 

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