Thursday, 12 December 2013

समलैंगिकता को वैधानिक मान्यता क्यों ?

समलैंगिकता आखिर है क्या ? अगर यह दो मित्रों को एक साथ रहने कि मान्यता है तो इसका वैधानिक मान्यता से क्या तात्पर्य है ? यदि यह मित्रता से अधिक कुछ है तो यह अप्राकृतिक यौनाचार हुआ | अप्राकृतिक यौनाचार स्त्री व पुरुष के संबंधो का अतिक्रमण करता है | यह स्वस्थ समाज के मापदंडो को भी प्रभावित करता है |

कल कोई व्याभिचारी यह कहे के यह शरीर मेरा है, मै इसका कुछ भी उपयोग करूँ | तो क्या यह किसी दूसरे के अधिकारों को अतिक्रमण नहीं हुआ ? फिर समलैंगिकता को वैधानिक मान्यता क्यों ?

एक विकृत व बीमार मानसिकता में भटके लोगो को सही रास्ता दिखाना हम सब का कर्तव्य है | इसे मानवाधिकारों के हनन का मामला नहीं कहा जा सकता | अगर यह शंका होती है कि पुलिस को किसी के भी बेडरूम में झांकने का अधिकार मिल जाएगा तो इस शंका का समाधान जरुरी है |

यह कहन अभी गलत है कि हम 2013 में 1860 को दोहरा रहे है | फिर 1860 ही अच्छा, जो सामाजिक इकाई को जोड़ने का काम करता है | जरुरी नहीं है कि हम पश्चिम का अनुकरण करे | क्या हम भारतीय पश्चिम को सही रास्ता नहीं दिखा सकते ? 

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