Wednesday, 11 February 2015

दीनदयाल जी उपाध्याय के विचारों में – “लोकतंत्र में लोकमत –परिष्कार कि अवधारणा”



समान लोक- इच्छा वास्तव में एक आवश्यक कल्पना मात्र है | सच तो यह है की जनतंत्र में किसी कि भी इच्छा नहीं चलती ,प्रत्येक को एक सामान्य इच्छा के अनुसार अपनी इच्छाओ ,मान्यताओ को ढालना होता है|
‘वादे –वादे जायते तत्वबोध:’यह हमारे यहाँ कि पुरानी उक्ति है |किन्तु तत्वबोध तो तभी हो सकेगा जब हम दूसरे कि बात को ध्यानपूर्वक सुनेंगे और उसमे से जो सत्यांश होगा उसको ग्रहण करेंने कि इच्छा रखेंगे|यदि दूसरे का दृष्टिकोण समझने का प्रयत्न न करते हुए हम अपने ही दृष्टिकोण का आग्रह करते जाए तो ‘वादे –वादे जायते कण्ठशोष’ कि उक्ति चीरतार्थ होगी|भारतीय संस्कृति वाद –विवाद को ‘तत्वबोध’ के साधन के रूप में देखती है|हमारी मान्यता है कि सत्य एकांगी नहीं होता,विविध कोणों से एक ही सत्य को देखा ,परखा और अनुभव किया जा सकता है|इसलिए इन विवधताओं के सामंजस्य के द्वारा जो सम्पूर्ण का आकलन करने कि शक्ति रखता है ,वही तत्वदर्शी है |वही ज्ञाता है |

दूसरे कि बात सुनना या उसके मत का आदर करना एक बात है और दूसरे के सामने झुकना बिलकुल भिन्न बात | दुसरे कि इच्छा के सामने झुकने कि तैयारी में एक खतरा सदैव बना रह्ता है | जो छुछे –सज्जन एवं धर्म-भीरु होते है वे तो सदैव अपनी बात का आग्रह छोड़ कर दूसरे कि बात मान लेते है ,किन्तु जो दुर्जन एवं दुराग्रही है वे अपनी बात मनवा कर समाज के अगुआ बन जाते है ,और धीरे –धीरे लोकतंत्र एक विकृत रूप में उपस्थित होकर समाज के लिये कष्टदायक हो जाता है |संभवतः,इसी संकट का सामना करने के लिये हमारे यहाँ के शास्त्रकारों ने लोकमत-परिष्कार की व्यवस्था की |

लोकमत –परिष्कार का कार्य वही कर सकता है जो लोकेषणाओ से ऊपर उठ चुका हो |भारत ने इसका समाधान खोज निकाला |भारत ने इस समस्या का समाधान राज्य के हाथ से लोकमत- निर्माण के साधन छीन कर किया है | लोकमत –परिष्कार का कार्य है वीतरागी द्वन्द्वातीत सन्यासियों का |लोकमत के अनुसार चलने का काम है राज्य का | सन्यासी सदैव धर्म के तत्वों के अनुसार ,जनता के ऐहिक एवं आध्यात्मिक समुत्कर्ष कि कामना लेकर अपने वचनों एवं निरिहबाचरण से जन-जीवन के ऊपर संस्कार डालते रहते है |उन्हें धर्म कि मर्यादाओ का ज्ञान कराते रहते है |कोई मोह और लोभ न होने के कारण वे सत्य का उच्चारण सहज कर सकते है |लोक –शिक्षा और लोक –संस्कार के वही केन्द्र है |शिक्षा और संस्कार से ही समाज के जीवन-मुल्य बनते है और सुदृढ़ होते है | इन मूल्यों को बांध रखने के बाद लोकेच्छा कि नदी कभी अपने तटो का अतिक्रमण कर संकट का कारण नहीं बनेगी |


अंत: सबसे अधिक महत्व है जनता को सुसंस्कृत करने का,लोकमत परिष्कार का |जब तक इस काम को करने वाले राज्य के मोह से दूर,भय से मुक्त ,महपुरुष एवं संघटक रहेंगे ,लोकमत अपनी सही दिशा में ही चलता जायेगा |

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