दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।१६||
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।१६||
सावधान मन
करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।। (सुन्दर-काण्ड)
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।। (सुन्दर-काण्ड)
परिवर्तन और निर्माण दोनों ही कष्ट साध्य हैं। भ्रूण
जब शिशु के रूप में धरती पर आता है तो प्रसव पीड़ा के साथ होने वाला खून खच्चर दिल
दहला देता है। प्रस्तुत परिस्थितियों के दृश्य और अदृश्य दोनों ही पक्ष ऐसे हैं
जिनके कण-कण से महाविनाश का परिचय मिलता है। समय की आवश्यकताएँ इतनी पड़ी हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए
बहुतों को बहुत कुछ करना चाहिए। विनाश से निपटने और विकास प्रत्यक्ष करने के लिए
असामान्य व्यक्तित्व, असामान्य कौशल और असीम साधन चाहिए। इतने असीम जिन्हें
जुटा सकना किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए कठिन है। उस सारे सरंजाम का जुटाना मात्र
परमेश्वर के हाथ है। हाँ इतना अवश्य है कि निराकार को साकार जीवधारियों में
नियोजित रण-नीति की और कौशल भरी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। सो भी बड़े परिमाण
ऐसे कार्यों का संयोजन तो सृष्टा की विधि व्यवस्था ही करती है, पर उसका श्रेय श्रद्धावान
साहसियों को मिल जाता है। हनुमान और अर्जुन की शक्ति उनकी निज की उपार्जित नहीं थी
वे सृष्टा का काम करते हुए उसी की सामर्थ्य को प्राप्त हो सके। अर्जुन को सारथी का
यदि समर्थन न रहा होता तो महाभारत कैसे जीता जाता? हनुमान स्वयं बलवान रहे होते तो
सुग्रीव सहित ऋष्यमूक पर छिपे-छिपे न फिरते। समुद्र छलांगने, लंका जलाने, पर्वत उखाड़ने की सामर्थ्य
उन्हें धरोहर में इसलिए मिली थी कि वह रामकाज में समर्पित हों। यदि निजी
मनोवाँछाओं के लिए किसी भक्त ने मागा है तो उसे नारद मोह के समय पर मिले उपहास की
तरह तिरस्कृत होना पड़ा है।
सभार-
अखंड-ज्योति ,पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य
टिप्पणी- परिवर्तन अवश्यंभावी हैं.क्योंकि इसके पीछे प्रभु की शक्ति कार्य कर
रही हैं |हमे तो निमित् मात्र बनना हें |इसलिए निष्काम –भाव व वैराग्य को धारण
करना परम आवश्यक कर्तव्य हैं |

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