Sunday, 23 March 2014

कब और कैसे मिलेगी जातिवादी दंश से मुक्ति ,इसकी कौन उठाएगा जिम्मेदारी -

कब और कैसे मिलेगी जातिवादी दंश से मुक्ति ,इसकी कौन उठाएगा जिम्मेदारी -

हमने अपनी आँखों पर बहुत सी पट्टीया बाँध ली हैं और कानों में रुइया ठूस रखी हैं |उदाहरण के तौर पर हम कह रहें हैं यह प्रत्याशी बाहर का हैं यह घर का |प्रत्याशी का व्यक्तित्व कैसा हैं , वह हमारा नेता बनने के काबिल हैं या नही इस पर विचार नही होता | आखिर पार्टी भी तो कुछ सोच कर ही प्रत्याशी को मैदान में उतारती हैं | जब एक –एक सीट का सवाल हों तब क्या पार्टी हारने के लिए चुनाव लडेगी ?आखिर हम क्यों जाति के आधार पर अपने क्षेत्र के प्रत्याशी की अभिलाषा करते हैं,ऐसी स्थिति में प्रत्याशियों का चुनाव करने में राजनीतिक दलों के समक्ष बड़ी चुनोती खड़ी हों जाती हैं |अच्छे नेता जो समाज को सही दिशा दे सकते हैं वे आगे नही आ पाते |यह ब्राह्मण भाई ,यह राजपूत भाई ,यह जाट भाई ,या अन्य कोई मेरी ही जाति-बिरादरी का भाई |मेरा तो यहाँ तक मानना हैं,इसी जातिवादी मानसिकता में माफियावाद व अन्य समाजिक वैमनस्यता अपना विस्तार पाती हैं | वहाँ भी हम जाने अनजाने में इस अव्यवस्था का समर्थन करते दिखाई पड़ते हैं |
क्या आपने किसी नेता को यह कहते सुना हैं मुझे केवल मेरी ही जात का वोट चाहिए और किसी का नही ? इस जातिवाद की राजनीति में कुछ गिने-चुने लोग ही फायदा उठाते हैं,आम आदमी का या आम पार्टी कार्यकर्ता का इसमें कोई फायदा नही होता ;वह तो केवल सुर में सुर मिलाने के काम आता हैं |इसमें सबसे ज्यादा नुकसान पार्टी व उसमे काम कर रहें आम कार्यकर्ता का होता हैं |इसमें भी सबसे ज्यादा नुकसान हमारे हिन्दुत्ववादी द्रष्टिकोण का हुआ हैं और हमे बाटने का काम हुआ हैं |इसलिए मित्रों इस कोंग्रेसी संस्कृति से बाहर निकलिए और देश के बारे में चिंतन करिए | मित्रों ध्यान रखे ‘यथा राजा तथा प्रजा या तथा प्रजा यथा राजा ‘ |अगर बदलाव लाना हैं तो, सर्वप्रथम राष्ट्र –हित बाकि के हित बाद में |
जात न पूछो साधु की ,पूछ लिज्यो ज्ञान |

मोल करो तलवार का ,पड़ा रहन दो म्यान ||

Thursday, 20 March 2014

भारतीय जनता पार्टी का हर एक कार्यकर्ता पार्टी का अनुशासित सिपाही हैं |

भारतीय जनता पार्टी का हर एक कार्यकर्ता पार्टी का अनुशासित सिपाही हैं | भारतीय जनता पार्टी उर्जावान व संस्कारित कार्यकर्ताओं की उर्वरक भूमि हैं जो देश के लिए किसी भी प्रकार के त्याग के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं इसमें कोंग्रेसी संस्कृति का लेशमात्र भी अंश नही हैं फिर टिकट वितरण तो मामूली सी बात हैं, किसी भी प्रकार की अंतर्कलह या मनभेद का तो सवाल ही नही उठता इसकी लड़ाई कोंग्रेस के कुशासन के खिलाफ हैं | यह देश में एक स्थिर सरकार के लिए काम करेगी | जल्द ही पार्टी का कार्यकर्ता यह सिद्ध करके दिखा देगा |
                             एक हैं अपनी जंमी 
                             एक हैं अपना वतन 

                            आवाज दो हम एक हैं


Tuesday, 11 March 2014

परिवर्तन अवश्यंभावी हैं.क्योंकि इसके पीछे प्रभु की शक्ति कार्य कर रही हैं |


दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।१६||
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।। (सुन्दर-काण्ड)

परिवर्तन और निर्माण दोनों ही कष्ट साध्य हैं। भ्रूण जब शिशु के रूप में धरती पर आता है तो प्रसव पीड़ा के साथ होने वाला खून खच्चर दिल दहला देता है। प्रस्तुत परिस्थितियों के दृश्य और अदृश्य दोनों ही पक्ष ऐसे हैं जिनके कण-कण से महाविनाश का परिचय मिलता है। समय की आवश्यकताएँ इतनी पड़ी हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुतों को बहुत कुछ करना चाहिए। विनाश से निपटने और विकास प्रत्यक्ष करने के लिए असामान्य व्यक्तित्व, असामान्य कौशल और असीम साधन चाहिए। इतने असीम जिन्हें जुटा सकना किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए कठिन है। उस सारे सरंजाम का जुटाना मात्र परमेश्वर के हाथ है। हाँ इतना अवश्य है कि निराकार को साकार जीवधारियों में नियोजित रण-नीति की और कौशल भरी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। सो भी बड़े परिमाण ऐसे कार्यों का संयोजन तो सृष्टा की विधि व्यवस्था ही करती है, पर उसका श्रेय श्रद्धावान साहसियों को मिल जाता है। हनुमान और अर्जुन की शक्ति उनकी निज की उपार्जित नहीं थी वे सृष्टा का काम करते हुए उसी की सामर्थ्य को प्राप्त हो सके। अर्जुन को सारथी का यदि समर्थन न रहा होता तो महाभारत कैसे जीता जाता? हनुमान स्वयं बलवान रहे होते तो सुग्रीव सहित ऋष्यमूक पर छिपे-छिपे न फिरते। समुद्र छलांगने, लंका जलाने, पर्वत उखाड़ने की सामर्थ्य उन्हें धरोहर में इसलिए मिली थी कि वह रामकाज में समर्पित हों। यदि निजी मनोवाँछाओं के लिए किसी भक्त ने मागा है तो उसे नारद मोह के समय पर मिले उपहास की तरह तिरस्कृत होना पड़ा है।
 सभार- अखंड-ज्योति ,पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य

टिप्पणी- परिवर्तन अवश्यंभावी हैं.क्योंकि इसके पीछे प्रभु की शक्ति कार्य कर रही हैं |हमे तो निमित् मात्र बनना हें |इसलिए निष्काम –भाव व वैराग्य को धारण करना परम आवश्यक कर्तव्य हैं |


Tuesday, 4 March 2014

जात ना पूछो साधू की, पूछलिजो ग्यान्

जात ना पूछो साधू की, पूछलिजो ग्यान्
मोल करो तलवार का , पड़ा रहने दो म्यान्.....संत कबीर वाणी
परन्तु भाई हमारे तथाकथित जाति-वादी ,सम्प्रदायवादी ठेकेदार तो, ‘जात ही पूछो साधू की ‘ वाली नीति ही अपनाएगे ;क्योंकि इसी-मे इनका फायदा हैं |भाङ में जाए समाजिक-न्याय, भाङ में जाए गरीब –गुरबा,इनकी राजनीतिक दुकान मजे से चल रही थी |पता नही ये मोदी नाम का दलित कहा से आ गया |अब तक तो हम इसे अलग प्रकार का जीव समझ रहे थे; न तो हमे इसके ज्ञान से मतलब न इसके काम से |जब -तक यह रास्ट्रीयता की बात करता था तब तक तो कोई चुनोती थी ही नही |क्योंकि हमनें वैमन्स्यता के बीज बड़े गहरे बो रखे हैं | परन्तु यह तो हमे हमारी भाषा में चुनोती दे रहा है |अब तो इसकी जात पूछनी ही पडेगी आखिर बताएगा क्या ?हम ठहरे इस खेल के पुराने खिलाडी; अकेला अभिमन्यु हम महारथियों के बीच क्या कर लेगा |