Wednesday, 20 November 2013

पूंजीवादी आलोचना का व्यर्थवादी नाद

आजकल कांग्रेस पार्टी के युवराज अपनी जनसभाओ में कहते सुने जा रहे है के भाइयो ' कॉरपोरेट सरकार चाहिए या आम आदमी की सरकार ' | उनके भाषणों को सुनकर क्या यह जनमानस मान ले के आजकल आप समाजवादी हो गए है या फिर कम्युनिस्ट चिन्तक ?
अरे साहब मनमोहन जी से तो पूछ लीजिए की उन्होंने FDI लाने के लिए देश के दरवाजे खोलने में कितना उतावलापन दिखाया | क्या वह पूंजीवाद को, वो भी विदेशी पूंजी के लिए संरक्षण व आत्मसमर्पण है ?

कांग्रेस के लिए विडंबना यह है, के आज भारतीय कॉरपोरेट जगत का विश्वास इस सरकार से उठ गया है | आर्थिक उदारवाद के इस दौर में यह स्थिति देश के लिए कितनी खतरनाक हो चुकी है, ये सभी अर्थशास्त्री अच्छी तरह से जानते है | अब कांग्रेस की समस्या दोहरी है | वह न तो आम आदमी का विश्वास जीत सकी और न ही उद्योगपतियों का |

अब श्रीमान जी कॉरपोरेट जगत कि भर्त्सना करने से आप पापमुक्त तो हो नहीं जायेंगे | जब आप 10 वर्षों के शासनकाल में संस्थागत व ढाँचागत विकास के लिए कोई नीति बनाकर लागू न कर पाए तो दोष आपकी स्वयं कांग्रेस सरकार का है | सच तो यह है के आप न तो समाजवादी, न उदारवादी और न मार्क्सवादी बन पाए | केवल व्यर्थवादी बनकर रह गए |

" एक ही विकल्प........एकात्म मानववाद "

Monday, 18 November 2013

व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम मौलिक स्वतंत्रता

कोबरा पोस्ट ने एक खुलासा किया | जिसमे उसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता कि जो चीर-फाड़ की है, वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन का बड़ा मामला बन गया है | मीडिया स्वयंभू निर्णायक बनता है और फिर वहीँ उसकी धज्जियाँ उड़ाता है |एक बड़ी पार्टी एक बड़े नेता को घेरने के लिए तुरतं उस मामले को लपक लेती है और मीडिया ही उसपर पुरे दिन हो-हल्ला मचाती है |

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग के एक मामले में यह निर्देश दिया था के ऑनर किलिंग से पहले परिवार अपने बच्चो को संभाले | क्या यह भी एक ऐसा मामला नहीं है, जब एक पिता गुप्त रूप से अपने बच्चो पर नज़र रखने के लिए प्रशासन से सहयोग प्राप्त करता है और प्रशासन पिता को गोपनीयता का आश्वासन देकर उसकी मदद करता है | वाक्या चाहे जो भी रहा हो, जिसका शायद किसी को पता नहीं तो क्या उस परिवार कि गोपनीयता खंडित की जानी चाहिए ? कोबरा पोस्ट ने मामले की गोपनीयता को खंडित कर उस परिवार की मर्यादा को सार्वजनिक किया है | जोकि मेरे दृष्टिकोण में एक गंभीर अपराध है | क्या एक पिता का अपने परिवार पर कोई अधिकार नहीं है ? और देश की एक बड़ी पार्टी के लिए यह मामला राजनैतिक दुरूपयोग का विषय बन गया है |

मै कोई बड़ा विद्वान तो नहीं परन्तु इतना अवश्य महसूस कर रहा हूँ इस मामले पर देश में राजनीती करना अनावश्यक है | क्या मीडिया का किसी ने निजी जीवन पर इस तरह का खुलासा करना उचित है जैसा कोबरा पोस्ट ने किया है ?