Saturday, 26 April 2014

एक परिवार का राजनीतिक बंधक भारत

भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को जिस प्रकार एक परिवार ने अपना बंधक बना रखा है ,ऐसी मिशाल दुनिया में अन्यत्र ही कही मिले | इस परिवार ने अंग्रेजो की “फुट डालो राज़ करो “ की नीति को ही नहीं अपनाया वरन वह सभी हथकंडे  अपनाये जो अंग्रेजो ने हिन्दुस्थान पर अपना राज़ कायम करने के लिये अपनाये थे | उनके इस कृत्य को आगे बढ़ाने के लिये वही लोग सहभागी होते है, जो उनसे बढ़ा लाभ पाते है |

इस परिवार की आखिरी पीढ़ी भी न तो भारतीय संस्कृति से कोई लगाव रखती है और न ही भारत के गौरवशाली इतिहास से | ये लोग भारतीय प्रतीकों पर निरंतर प्रहार करते है और भारत के महापुरुषों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा  करते है | ये लोग माता सीता पर तो सवाल खड़े करते है परन्तु अपनी माँ से कभी यह नहीं पूछते के विवाह के उपरांत भी एक लंबे समय तक उन्होंने भारत की नागरिकता क्यों नहीं ग्रहण की? आज उस परिवार के अंतिम वारीस राहुल ने श्री गुरूजी पर सवाल उठाये, मै उसका जवाब देना भी उचित नहीं समझता क्योंकि वह उस महापुरुष के चरणों की धुल के समान भी नहीं है |



इन लोगों को झूठ बोलना घुटी में पिलाया गया है और इनका जन्म ही कुसंस्कारों के मध्य हुआ है | इसका एक उदाहरण ये है कि, ये लोग अपनी विपक्षी पार्टी के लिये कहते है के इनके यहाँ बुजुर्गो का सम्मान नहीं होता, जिसे यह कभी सिद्ध नहीं करते | इसके उत्तर में कहना चाहूंगा के अपमान तो आपने स्वयं श्री मनमोहन सिंह जी व उनकी कैबिनेट का किया जो पुरे देश ने देखा था | मनमोहन सिंह जी बुजुर्ग ही नहीं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री भी है | राहुल ने भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसन मनमोहन सिंह जी का पुरे देश के समक्ष अपमान किया | वह भी उस समय जब वह विदेशी दौरे पर थे | ये लोग उस त्याग का भी सम्मान नहीं करते जो अपने वंश को बढ़ाने से ज्यादा देश के लिये अपना जीवन समर्पित करता है | ये लोग उसकी भी भर्तस्ना यह कह कर करते है, जो अपनी नारी का सम्मान नहीं कर सका वह ओरों का क्या सम्मान करेगा | इसी प्रकार अनेक तरह के प्रपंचो का जाल ये लोग फैलाते रहते है |

इन लोग ने इस देश को राजनीतिक रूप से बंधक रख कर जो-जो कुकर्म किये, उसका जवाब इनके पास कुछ नहीं | इसलिए वोट पाने के लिये निरंतर गुमराह करने वाले बयान दिए जाते है या फिर भावनात्मक अपील जारी कर जनता को बरगलाया  जाता है |

Wednesday, 2 April 2014

श्री अरविन्द के विचार आज भी उतने ही महत्व रखते है,जितने आजादी के समय ।

आज भी शासन व्यवस्था ब्रिटिश शासन के द्वारा पंहुचाये गये लाभउसकी न्याय प्रणाली में विश्वास व ब्रिटिश शिक्षा उपयुक्तता का गुणगान करते है यह आज भी कांग्रेस- दल के विचारों का स्त्रोत बना है ब्रिटिश शासन व्यवस्था की मूल भावना हिन्दुस्थान पर अपना राज़ कायम रखना था इसलिए उसने हर वह कार्य किया जो आम हिंदुस्तानी को उसके गौरवशाली इतिहास से वंचित रखता

श्री अरविन्द ने स्वतन्त्रता का लक्ष्य ब्रिटिशों के प्रति घृणा अथवा उनके कुशासन,अत्याचार के आरोपों के आधार पर नही ,बल्कि भारतीय राष्ट्र के स्वतःसिद्ध अधिकार के बल पर किया था उनहोंन “अंग्रेजी और नौकरशाही शासन” कि तुलना और विरोध मे ‘भारतीय और राष्ट्रीय शासन’ की पदावली का प्रयोग कियाजो आज भी प्रासंगिक है ( इस अर्थ मे की नौकरशाही आधारित शासन राष्ट्रीय नहीविजातीय है ) श्री अरविन्द ने लिखा, “ कोई पराधीन राष्ट्र क्रमशः प्रगति करते –करते स्वतन्त्रता तक नही पहुँचताबल्कि स्वतन्त्रता प्राप्त करके अपनी प्रगति का मार्ग खोलता है विदेशी शासन के कारण भारत में जो नपुंसकताप्रगति में अवरोधशिथिलतादरिद्रताआर्थिक दासता आदि के जो बुरे परिणाम हुए थेउसकी आलोचना "वन्दे मातरम और धर्म" के पन्ने पर ऐसे तीव्र शब्दों और दृढ़ता के साथ की गयी जो पहले कभी नहीं की गयी थी इसने बल दिया की विदेशी शासन कितना भी उदार क्यों न होंवह स्वतंत्रस्वस्थ राष्ट्र जीवन का स्थान कभी नहीं ले सकता 

इन लेखो के कारण राष्ट्रवादियों के विचारों की सर्वत्र विजय हुई  एक राष्ट्र के विचारों को पलटने और उसे बृहत परिवर्तन के लिये तैयार करने में "वन्दे मातरम" ने जो प्रभाव डालावह पत्रकारिता के इतिहास में अद्वितीय ही था