भगवान्
इस जगत के कण-कण में विद्यमान है | स्त्री व पुरुष इन दो रूपों में परमात्मा इस
श्रृष्टि की सबसे अनुपम अभिव्यक्ति है | इस अनुपम अभिव्यक्ति कि प्रसांगिकता आज किस रूप
में हमारे समक्ष है | विभिन्न संदर्भो में इसकी विवेचना घट रही घटनाओ व अनुभव के आधार पर
कि जाए |विचारों कि नवीनता के लिए आए कुछ
विमर्श साँझा करते है |
पश्चिमी
सभ्यता का जो प्रवेश भारतीय विचारों में हुआ या हो रहा है, वह किस रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है | आज
स्त्रियाँ व पुरुष घर से बाहर शिक्षा प्राप्ति के लिए या काम –काज के लिए अपने पारिवारिक परिवेश से दूर रहते है| जहाँ वह अकेला-पन मह्सुस करते है, परन्तु एक चीज़ जो हमेशा उनके साथ रहती है, वह है निजी संस्कृति व संस्कार | अब यह सांस्कृतिक विरासत पश्चिमी है या शुद्ध
भारतीय, उसके गुण व अवगुण क्या है ? हम
उसे अपने रहने व चलने फिरने के तौर-तरीको में कैसे अभिव्यक्त करते है, या घर के अंदर भी जहाँ हम संयुक्त परिवारों में रहते है, वहा संबंधो कि व्यवस्था कैसी है|
पश्चिमी
दृष्टीकोण हमें अधिक आजादी देता है, परन्तु
वह अपने अवगुणों को भी साथ लेकर आता है | हम उसे भारतीय गुणों के अनुसार नहीं ढाल पाते |क्योंकि पश्चिमी द्ष्टि में भोग-विलास की प्रधानता
हैं | भारतीय दृष्टि में त्याग व तपस्या की प्रधानता हैं |
भारतीय दृष्टीकोण-
शुकदेव मुनि को स्त्री व पुरुष के शरीर का भान (ज्ञान) तक
नहीं था | वह सच्ची ब्रह्म दृष्टि थी | वह स्त्री व
पुरुष में केवल परमात्मा का दर्शन पाते थे| जब उन्होंने
प्रथम में स्त्री के रूप का दर्शन किया तब उन्होंने स्त्री के स्तनों को देखकर
पूछा माता ये क्या है ‘तब स्त्री को आश्चर्य हुआ और
उसने कहा यह जन्म के बाद बच्चे को दूध पिलाने के लिए शरीर का अंग-मात्र है’| तब शुकदेव मुनि ने आश्चर्य करते हुए कहा के भगवान ने जन्म से पहले ही जीव
के भोजन कि व्यवस्था कर दी | ये प्रसंग हमारे
भागवत महापुराण का है |इसके अलावा हमारी संस्कृति में
माता अनसुया का चरित्र है, जहाँ परीक्षा लेने गए तीनों
देवो को माता ने अपना पुत्र बना लिया | उसी माता
अनसुया से माता सीता ने स्त्री धर्म कि शिक्षा ली | हमारे यहाँ कहा जाता है के अगर रामयण से माता सीता के चरित्र को निकाल दे
तो रामायण प्रभाव शून्य हो जाए | इसी तरह हमारे
यहाँ उच्च स्त्री चरित्र कि लंबी श्रृंखला मिल जायेगी |स्त्री –पुरुष के संबंधो की गहरी व्यवस्था भारतीय संस्कृति में है | जितने गहरे उतरोगे उतने ही मोती मिल जायेंगे |
प्रभु श्री राम व माता सीता के संबंध में एक लौकिक मिथक चलाया गया |कहा गया कि ‘सीता अगर रावण के सामने समर्पण कर देती तो श्री राम जी का पोरुष ’ धरा रह गया होता या माता सीता कि अग्नि परीक्षा पर सवाल उठाया जाना व राम
जी के द्वारा माता सीता का त्याग | इन सभी मिथकों
ने जिस प्रकार परम पुरुष के प्रेम व उनकी अंत:दृष्टि को एक अन्याय पूर्ण आलोचना
द्वारा जिस प्रकार कटघरे में खड़ा किया, उसकी तुलना किस
से की जाए ?
क्या जंगल में नंगे पाँव घूमते हुए एक पतिव्रता स्त्री के लिए उनके
द्वारा किया गया विलाप स्त्री वाद के लिए सम्मान का अधिकारी नहीं ? हे सीते, हे सीते कहते हुए जब वे अपनी प्राण प्यारी को पुकारते हुए इधर उधर
भटक रहे थे, तो क्या वह किसी रंग मंच पर नाटक कर रहे थे ? पता लगने पर के उसे दश –शीश वाला रावण उठा ले
गया है ,तो वे अपने उसी तपस्वी वेश में नंगे पाँव वानर
सेना के साथ लेकर उस काम रूपी रावण से जा भिड़े जिससे उस समय तीनों लोक कांपते थे | श्री राम जी ने एक पत्नी-व्रत का व माता सीता ने एक पति-व्रत का पालन किया |
एक प्रसंग के अंतर्गत एक कथा का उल्लेख और भी आवश्यक है | भगवान शिव के आराध्य
श्री राम है , जब उमा ने देखा के राम जी तो स्त्री
वियोग में विलाप करते घूम रहे है, तो उन्होंने भगवान
शिव से कहा के जिसे आप परमब्रहम् बताते है और निरंतर जिनके ध्यान में निमग्न रहते
है, वे स्त्री विलाप में भटकते फिर रहे है | तब भगवान शिव ने समझाते हुए कहा के प्रभु इस लोक में मानव जीवन को व्यवहार
का ज्ञान देने के लिए लीला कर रहे है |परन्तु उमा नहीं
मानी और जा पहुंची राम जी कि परीक्षा करने | उन्होंने सीता का रूप बनाया और रास्ते मे खड़ी हो गई | राम जी ने उन्हें देखकर ‘ दो बार रास्ता
बदला ’ फिर भी वे सामने आ ही गई | सामना होने पर श्री राम जी ने सर –झुका कर कहा
हे ! माता आज आप अकेली घूम रही है भगवान् भोले नाथ कहा है | ऐसी थी प्रभु श्री राम कि अन्तदृष्टी जिन्होंने सीता जी के रूप में परायी
स्त्री को भी माँ का दर्जा दिया | उनका सपष्ट
निर्देश था की कोई परायी स्त्री अपनी पतिव्रता स्त्री के रहते आपकी पत्नी होने का
निवेदन भी करे तो उसे माँ का दर्जा देते हुए स-सम्मान अस्वीकार कर देना |
उसके उपरांत उमा शिव के पास गई तो शिव ने उमा से कहा आ गई परीक्षा
करके, परन्तु
हे उमा, आपने जिस रूप को धारण कर श्री राम कि परीक्षा
कि वह तो माता सीता का रूप था | जिस माता का शरीर
आपने धारण किया उसे अब में पत्नी रूप में कैसे स्वीकार करूँ | भगवान शिव ने एक कदम और आगे बढाया और उन्होंने यह आदर्श सामने रखा की जो
माता के रूप में स्वीकार्य है,उसे पत्नी के रूप में कैसे
स्वीकार किया जा सकता है | गुरु पत्नी , भाई की पत्नी ,माँ की बहन व माँ की हम उम्र सभी
स्त्रियाँ सगी माता समान हैं | इसी तरह इन सभी को
स्त्री भी अपने पिता तुल्य समझे | शिष्या ,पुत्र-वधु ,बहन अपनी कन्या समान हैं | कुंवारी कन्या में तो साक्षात् माँ भवानी का दर्शन करना चाहिए व अगर गलती
से पाव का भी स्पर्श हो जाए तो क्षमा मांगकर प्रणाम करे | कहा गया है ‘ जैसी द्रष्टि वैसी
स्रष्टि ’ | जो दश इन्द्रियों को वश में करे वही
दशरथ है और उसी के घर (मन-मंदिर) में श्री राम का आगमन होता हैं |
रामायण में प्रसंग आता है,वनवास के समय एकांत में श्री राम जी ने माता सीता
से कहा कि जगत को व्यवहार का ज्ञान कराने के लिए लीला का समय आ गया है | अब आप जाकर अग्नि में निवास करे | लौकिक
अग्नि परीक्षा तो माता सीता कि रावण के यहाँ हो चुकी थी ,तो प्रश्न उठा के अग्नि परीक्षा कैसी? इसका
संबंध इसी प्रसंग से है | माता सीता का जो रूप
अग्नि में वास कर रहा था उसे माता सीता के मूल तेजेस्वी रूप में समाहित करना था यह
अलौकिक प्रसंग है | लौकिक दृष्टीकोण से कहे तो वह
परीक्षा माता सीता के ओजस्वी रूप की पुनः स्थापना थी |
श्री राम जी ने माता सीता से कभी नही कहा की वे घर छोड़ दे ,केवल इतना कहा कि मै अब
आपके साथ नहीं रह सकता | माता सीता अपने पति के
धर्म व उसके मर्म को जानती थी, सो उन्होंने गृह त्याग
श्रेयस्कर समझा | परन्तु उसके पाश्चात् न कभी राम
जी भी सुख से रहे न माता सीता | श्री राम –सीता कि संतानों ने जब राम जी को अहसास कराया की उनसे भूल हुई है ,उन्हें माता सीता का इस तरह परित्याग नहीं करना चाहिए था | श्री राम जी जब माता को लेने वाल्मिकी आश्रम गये और माता सीता को इसका पता
लगा तो वे सदेह पृथ्वी में समां गई | माता सीता ने
प्रभु को प्रायश्चित का अवसर भी न दिया | प्रश्न ? जो खड़ा था अनुतरित रह गया | शायद
उन्होंने सन्देश दिया की जो भी फैसला करे सोच समझ के करे | इसे इस प्रकार भी कह सकते है,की स्त्री –पुरुष संबंध ही इतने व्यापक है की अंतिम फैसला स्वयं उनके उपर ही छोड़
दिया जाए | किसकी कलम में इतनी ताकत है जो
स्त्री-पुरुष के चरित्र को एक सीमा में बांध सके |
श्री राम जी व माता सीता का चरित्र तो पूर्णब्रहम परमेश्वर का व
जगन्नमाता का चरित्र है | इनकी लीला का पार बड़े –बड़े योगी व संतो ने न
पाया, उसका वर्णन तो मुझ जैसा साधारण व्यक्ति कर ही
कैसे सकता है ? जिसे व्याकरण का भी ठीक तरह से
ज्ञान नहीं | विचार प्रभाव मन में उठ रहे थे केवल
उन विचारों को विमर्श के लिए आपके सामने रख रहा हूँ | नेति....नेति
पश्चिमी दृष्टीकोण व हमारा वर्तमान –
पश्चिमी दृष्टीकोण स्त्री –पुरुष संबंधो की सात्विक व्याख्या नहीं कर
सकता |क्योकि वहा काम –दृष्टी
की प्रधानता है , जो हेय दृष्टी है | वासनाओ की पूर्ति कैसे हो वहा इस दृष्टीकोण की प्रधानता है | जंहा आरामदायक और सुविधाजनक स्वछन्द जीवन जीने को ही श्रेष्ठ समझा जाता है | वहाँ त्याग व तपस्या का कोई मूल्य नहीं |
जंहा पश्चिम के लोग हमारी विवाह पद्धति व आपसी संबंधो को श्रेष्ठ
मानते है ,वही
हम अपने संस्कारो को पुरातन व दकियानुसी बता रहे है | आज भी अरेंज मेरिज का प्रतिशत प्रेम विवाह से ज्यादा हैं | जहा समाजिक दबाब अच्छे सम्बन्धों की गारंटी बन जाता हैं | जो आपसी विश्वास को और ज्यादा मजबूत कर देता हें | टूटते तो दोनों तरह के रिश्ते हैं परन्तु जब प्रेमविवाह टूटता हैं तो
व्यक्तित्व पर ज्यादा ठेस लगती हैं | प्रेम विवाह
निरा विवाद का विषय भी नही परन्तु अगर उसमे लालच या विषय भोग की प्रधानता होगी तो
वह निष्फल ही होगा | इसलिये शांत व शुद्ध प्रवृति
अत्यावश्यक हैं | फिर प्रेम विवाह को भी अरेंज
मेरिज का स्वरूप दिया जा सकता हैं | हम स्त्री –पुरुष संबंधो में ज्यादा आजादी की मांग करते रहे है जिसका आधार वासना
पूर्ति है |शादी दो चार साल का अनुबंध होना चाहिए यह
मांग कुछ इसी तरह की है के‘तू नहीं तो और सही और नहीं तो और
सही’ | जबकि शरीर तो प्रतिक्षण ह्रास (मृत्यु) की तरफ
जा रहा है| अ-समय आई रुग्णता में कौन –किसका सहायक होगा ? इस मानव शरीर का आखिर
अंतिम लक्ष्य क्या है, जिसे अवश्य एक दिन मृत्यु को
प्राप्त होना है |
योंन–संबंधो की आजादी योंन सक्रमण को ही बढावा नहीं देती वह पवित्र प्रेम को भी
बाटने का कार्य करती है | जंहा प्रेम के पात्र रोज
बदले जायेंगे वहा तो प्रेम की प्रधानता केवल वासना पूर्ति का साधन मात्र बन जायेगी |
‘ प्रेम न बाड़ी उपजे प्रेम न हाट बिकाय, राजा –प्रजा जाहुँ चहे शीश देई ले जाए’
| प्रेम तो त्याग मांगता है,समर्पण
मांगता है | धिक्कार है उस प्रेम पर जो प्राप्त न
होने पर अपनी ही प्रेयसी पर तेजाब फेककर हमला करे |
केटवाक करती महिलायों के वस्त्र एक भटके से शरीरसे अलग हो जाते है, फिर झूठा माफ़ी – नामा के ऐसा गलती से हुआ | हमने पश्चिमी
दृष्टीकोण को अपने रहन-सहन ,खाने–पीने
व चलने-फिरने तक में विकसित कर लिया है ,और करते ही जा
रहे है |
जंहा पश्चिम फास्ट फ़ूड संस्कृति से तंग आ गया है, सैकडो तरह की बिमारिया
घेरे रहती है | वहा हम खान –पान में फास्ट फ़ूड व मांसाहार को अपने भोजन का अंग बना रहे है | आज विज्ञान भी यह मान रहा है की ‘सात्विक भोजन
से सात्विक विचारों का गहरा संबंध है’ |
मेरे स्वयं के लड़के को पहेली दफा घर से बाहर रहने काम पड़ा और वह
दो जींस पेन्ट लेकर आया | मैंने पूछा आज तक तो तुमने यह नहीं पहनी फिर क्यों ले आये | यह तिरपाल जैसा कपड़ा क्या तुम्हारे अंगों को सुरक्षित रख पायेगा | उसने कहा पापा इनका फायदा यह है की इन्हें पहनकर में सप्ताह भर बिना धोए
काम चला लूँगा | दिल्ली में कहा कपड़े धोऊंगा कहा
सुखाऊंगा |उसका तर्क ठीक भी था में चुप रहा | कुछ दिन बाद वह फटी हुई पेन्ट खरीद लाया उसने शायद कहा के यह स्ट्रेचेबल
जींस है | उसकी माँ बड़ी क्रोधित हुई के रुपए खर्च
करके फटी हुई पेंट खरीद लाया | मैंने उसे समझाया
देख फटे कपड़े पहनना दरिद्रता की निशानी है ,अगर रुपए
से दरिद्रता न भी आई तो विचारों में दरिद्रता आ ही गई | अब वह जब इन पैंटो की धुलाई करते हुए कुडती है, कहती है के इनमे इतना मैल भरा है जितना मेरे घर में लगने वाले पोचो में भी
नहीं | अब कपड़े धोने की मशीन की मांग हो रही है | समस्या यह है के महंगाई के इस दौर में मशीन खरीदने की हिम्मत नहीं सो मै
उसके इस कार्य में उसका हाथ बटा देता हूँ | बहरहाल
हिन्दुस्थान में बने आज सूती कपड़े के सबसे बड़े आयातक पश्चिमी देश है | हम हम उस कपड़े का प्रयोग कर रहे है जिसमे प्लास्टिक मिला है |
अब कुछ बाते चलने –फिरने के बारे में हो जाए | मै ट्रेन में सफर कर रहा था |जंहा मुझे उतरना
था वह स्टेशन आ गया था | दरवाजे के समीप दो
महिलाये खड़ी थी मैने उनसे कहा बहनजी थोडा रास्ता दीजिए मुझे उतरना है | वह एक दम भड़क कर हरियाणवी लहजे में बोली ‘ मैं के तन्ने मायावती ला ली जो बहन जी कहवे से’ | मै सकपका गया और कहा सॉरी मैडम जी, वे कोई
स्कूल टीचर थी | जैसे बहन जी शब्द मायावती जी के
लिए ही पेटेंट हो गया है, ‘मैडम ’ कहा तो सही, ‘ बहन जी ’ कहा तो गलत | क्या मैडम कहने से लगता है
की यह पढ़ा लिखा होने का प्रतीक है ,चाहे उससे अपनत्व
या शालीनता न हो | ऐसे ही युवाओ को कहते सुना जा
सकता है ‘हाय फ्रेंड या हेल्लो गाइस |हेल्लो ब्रदर या हेल्लो सिस्टर नहीं | धीरे –धीरे युवाओ में भी यह बात आने लगी है के क्यों किसी राह चलती को बहन जी
कहा जाए, मैडम कहने में सहुलियत ज्यादा है | इसी तरह से साथ जा रहे लड़का –लड़की को भी हम
सही नजरो से नहीं देख पाते | वहा भी सोचना यह रहता
है के कुछ न कुछ तो चक्कर होगा | चाहे जाने वाले
भाई –बहन या पिता –पुत्री ही
क्यों न हो | हो सकता है उनका संबंध माता –पुत्र का हो | जहां किसी के भी साथ
परिवारिक या व्यक्तिगत मेल-जोल बढ़ा नही के वहाँ भी नजायज सम्बन्धों की खोजबीन
शुरू कर दी जाती हैं | चाहे वे सम्बन्ध कितने भी
पवित्र क्यों न रहे हो |आखिर यह गिरावट आई कहा से हैं ? यह भी वास्तविकता है ,राह चलते यह पता भी नहीं
चलता के जाने वालों का संबंध किस प्रकार का है | जबकि
हमारे शास्त्रों में कहा गया है के राह चलते अपने पूजनीय विद्वान व्यक्ति के पद
चिन्हों का अनुसरण तो करो पर कंधे से कंधा मिलाकर न चलो |
आजकल टी.वी. चैनलों पर पुरे रोब व जोश के साथ महिलाओ को बहस में
सम्मिलित होते देखा जा सकता है | यहाँ एक मिथक की चर्चा करना चाहूँगा |कहा जाता है के हमे औरत रहने दो देवी मत बनाओ | वाह ! क्या तर्क है ?क्या औरत कहने से आप
सुरक्षित है देवी कहने से नहीं ? इसी नवरात्रों का
एक प्रसंग याद आ गया | नवरात्रों के समापन पर नो
कन्याओ को भोजन करवाया जाता है | भोजन के उपरांत
गृहस्थ दम्पति सम्मान सुचक कन्याओ के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेते है | काम की व्यस्तता के चलते हम दम्पति यह कर्म भूल गए | तभी पांच वर्षीय बच्ची ने आवाज़ लगायी के आओ ‘आशीर्वाद
तो ले लो’| मुझे लगा के जैसे साक्षात् भवानी माँ ही
उनके श्री मुख से बोल रही है | साथ ही लगा की हम
आज भी भारतीय संस्कृति में जी रहे है | इन मीडिया
चैनलों पर बहस के दौरान उन महिलाओ की उपस्थिति में जब विज्ञापन के लिए दो मिनट का
ब्रेक लिया जाता है तब ऐसे ऐसे विज्ञापन चलते है के आप अपने परिवार के साथ उन्हें
नहीं देख सकते | सभी वस्तुओ को केवल महिलाओ के
माध्यम से ही बेचा जाता है |
पश्चिमी तर्ज पर पूरी चमक –दमक के साथ महिला सेमीनारो का आयोजन होता है | महिला विकास पर पश्चिम की मोहर लगाई जाती है | क्या कभी कोई महिला संगठन उन साध्वी महिलाओ के साथ महिलाओ के बारे में
चर्चा करता है ,जो आज भी इस चमक से दूर ईश्वर की खोज
में लगी है | ब्रहम कुमारी जो ओम शांति का पाठ
पढ़ाती है या जैन साध्विया | हिन्दुत्व के प्रचार
में लगी ब्र्हम्चारणी की तो बात ही मत करिये क्योकि यह देश साम्प्रदायिकता
का लबादा जो ओढ़े है | क्या ये मीडिया चैनल कभी इन
साध्वियो या सन्यासियों से भारतीय नारी का पक्ष जानने की कोशिश करते है ? शायद इस कारण के ये सभी हिन्दुत्ववादी दर्शन के परिचायक है ,जिसे दकियानुसी कहकर त्याग दिया गया है |
क्या महिला अधिकारियो का भी राजनीतिकरण हो गया है | कमाल की बात यह है
के स्वयं महिलाये ही इस कार्य को आगे बड़ा रही है ,या
फिर कहे राजनीति में यह प्रयोग बढ़ रहा है | ये
उसी प्रकार का राजनैतिक प्रयोग है जैसा साम्प्रदायिक शब्द का प्रयोग | इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम नेहरु जी ने सरदार पटेल के लिए किया था | जहा उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए सदस्यों का बहुमत नहीं था | वह जानते थे के देर - सवेर यह बात फिर उठाई जा सकती है | हालाँकि नेहरु द्वारा सरदार पटेल को साम्प्रदायिक कहने पर गाँधी जी ने
विरोध भी जताया था जिनकी इच्छा पर ही नेहरु जी प्रधानमत्री बने | तब से लेकर आजतक रह–सहकर उस साम्प्रदायिक
अलंकार का प्रयोग सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीती में होता रहा है | इस साम्प्रदायिक शब्द से आज जन मानस का कितना भला हुआ यह सब जानते ही हैं | परन्तु भद्र पुरुषों को चिंता सताने लगी है ,जो
स्वाभाविक भी है | शायद भद्र महिलाये भी सोच रही
होगी की आखिर ये हो क्या रहा है ? राजनीति सभी
संस्थानो पर हावी रहना चाहती हैं |समाज, राजनीति का एडवांस गाइड होता हैं यह सिद्धांत कहाँ गया ?
आज परिवारो की सामाजिक स्तिथियाँ कैसी है ,लगभग परिवारों में दो ही
बच्चे है ,दोनों लड़के भी हो सकते है दोनों लड़किया भी | रिश्ते भरभरा रहे है, ताऊ-ताई ,मामा ,भुआ ,चाचा –चाची लुप्त होते जा रहे है | उपर से
रिश्तों का आंकलन रूपये के आधार पर हो रहा हें | जिस
कारण रिश्तों के बीच दरार चौड़ी होती जा रही है | सम्पति
को लेकर सबसे अधिक वाद-विवाद आज भाई-भाई या बहन-भाई के बीच में है | संयुक्त परिवारों की तो बात छोड़ीये ‘मै
और मेरा मियां ’के एकल परिवार भी टूट रहे हैं | रुपया आना चाहिए चाहे जैसे आये | हर एक
चीज का व्यवसायीकरण व उससे अधिक से अधिक लाभ इस सोच ने हमारे चरीत्र का पतन कर
दिया हैं | इस कारण समाज में विघटन निरंतर बढ़ता
जा रहा हैं | जिसके स्पष्ट संकेत घटने वाली घटनाएँ
हैं | आज किसी को भी सम्पूर्ण रूप से सुखी नही कहा
जा सकता चाहे उसके दुःख का कारण जो भी हैं | आखिर
हम अपना जीवन ऐसी वैमनस्यपूर्ण परिस्थितयों में क्यों जिए ? हमे चिन्तन करना होगा |
जब हम एकाकी जीवनशैली जीने को मजबूर है तो क्यों न हम समाज में नए
रिश्ते तलाशे | क्यों न पड़ोस में या अपने ऑफिस में रक्षाबंधन व भैयादूज का त्योंहार
मनाएं |
कुछ चर्चा हम हमारे वर्तमान सिने जगत कि भी करते है | हम सपष्ट देख सकते
है उसमे कितनी भिन्नता आ गई है | हिंदी सिनेमा को
कभी समाज का आईना कहा जाता था | परन्तु आज हम ऐसा
नहीं कह सकते | पहले कि बनी रामायण व आज कि
रामलीला में कितना भारी अंतर है | स्कूल-कॉलेज पर
फिल्माए गये दृश्य और आम सामाजिक परिवेश में कितना भारी अंतर है |हिंदी सिनेमा को होलीवुड जैसा ही बोलीवुड नाम ही नहीं दिया गया बल्कि उस
जैसा एक वैचारिक कचरा भी फ़ैल गया | उसकी कामुकता
पर सेंसर बोर्ड कि कैंची भी नहीं चलती |
पश्चिम ने हमे जो आजादी दी हें उसका स्वागत करिए | उसे शुद् भारतीय
सांचे में ढालिए | हमे यह ध्यान रखना ही होगा के
स्त्री-पुरुष संबंधो कि डोर टूटने न पाए और न ही इसमें किसी तरह कि गांठ पड़े |
अंत: - एक मंत्र आपको देता हूँ जो बड़े काम का है | इसे प्रयोग करके
जरुर देखियेगा | इसमें आपको कोई खर्चा नहीं करना, केवल अपने लिए पांच मिनट देना है |
जब सांयकाल संध्या समय आपके ऑफिस या घर कि लाइट जले, उस समय सब काम रोक कर यह
क्रिया दोहराएँ – सर्वप्रथम अपनी दोनों हाथो की
उँगलियों को अपने दोनों नेत्रो पे लगाकर अपने इष्ट प्रभु का ध्यान करे, अपने अंतर मन में यह महसूस करे कि मै एक आत्मा हूँ और मुझमे उस परमात्मा
का निवास स्थान है | जब आपको अंदर रौशनी महसूस हो
तो दोनों हाथ जोड़कर नेत्रो को खोल दें | उसके बाद
कोई भी एक मंत्र जैसे – “ हरे रामा हरे हरे, हरे कृष्ण हरे हरे ” का जाप करे | यह सम्पूर्ण क्रिया केवल पांच मिनट आपको करनी है | आप देखना इसके आश्चर्यजनक सुखद परिणाम आपके सामने आयेंगे | दिन भर कि मानसिक थकान दूर हो जायेगी | रात्रि
के समय आपको कामवासना नहीं सताएगी | क्योंकि
कामवासना का प्रवेश मन में संध्या के समय होता है और वह रात्रि को फलीभूत होता है | जब संध्या समय मन में श्री राम जी का प्रवेश हो जाएगा तो कामवासना को
प्रवेश का रास्ता ही नहीं मिलेगा |
जहाँ राम है वहाँ काम नहीं और जहाँ काम है वहाँ राम नहीं |
ॐ हरिये नमः , ॐ हरिये नमः , ॐ हरिये नमः
जय श्री राम |